साई की निकली है पालकी साईं भजन
साई की निकली है पालकी साईं भजन
साईं की निकली है पालकी,
देखो रे — छवि है जिसकी कमाल की।
जो भावना से काँधों पे इसको उठायेंगे,
वो अपने मनोरथ पूरे कर जायेंगे।
पलटे हैं सबके नसीब ये,
तख़्त बिठाए क़रीब ये।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(अंतरा 1)
देखो रे शोभा क्या फूलों के जाल की,
साईं जी की निकली है पालकी।
जो "जय साईं, जय साईं" बोलते,
ये साईं उनके किस्मत के दरवाज़े खोलते।
जो करता है सेवा,
मिले रहमत का मेवा।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(पुनरावृत्ति)
साईं साईं बोल — जय जय साईं बोल,
जय साईं बोल — तेरा चाँदनी का मोर।
जय हो साईं साईं, जय हो साईं जय हो,
जय हो साईं साईं, जय हो साईं जय हो...
(अंतरा 2)
हो साईं महादानी, साईं शहनशाह — जय हो,
साईं को न जाना देना मन से — जय साईं।
साईं तो हैं प्रेम के भूखे — जय हो,
उन्हें न रिझाये कोई धन से — जय साईं।
भक्तों के बस में रहते — जय हो,
ये हैं दुश्मन अभिमान के — जय साईं।
सबकी है इनको ख़बर रे — जय हो,
सपने हैं क्या इंसान के — जय साईं।
बोलो बोलो साईं की जय बोलो,
ना तुम डोलो — बोलो रे!
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(अंतरा 3)
ओ पालकी में जो बैठी है हस्ती — जय हो,
वो ही हम सबको है पालती — जय साईं।
नित नये करामत करके — जय हो,
अपनी मुरादों को सँभालती — जय साईं।
देखने में लगता फ़क़ीर जो — जय हो,
दुनिया का वो सुल्तान है — जय साईं।
हम तो बहकते भटकते — जय हो,
वो ही हमारा निगेहबान है — जय साईं।
बोलो बोलो साईं की जय बोलो,
ना तुम डोलो — बोलो रे!
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(पुनरावृत्ति / समापन)
साईं की निकली है पालकी,
देखो रे — छवि है जिसकी कमाल की।
जो भावना से काँधों पे इसको उठायेंगे,
वो अपने मनोरथ पूरे कर जायेंगे।
पलटे हैं सबके नसीब ये,
तख़्त बिठाए क़रीब ये।
जो "जय साईं, जय साईं" बोलते,
ये साईं उनके किस्मत के दरवाज़े खोलते।
जो करता है सेवा,
मिले रहमत का मेवा।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
देखो रे — छवि है जिसकी कमाल की।
जो भावना से काँधों पे इसको उठायेंगे,
वो अपने मनोरथ पूरे कर जायेंगे।
पलटे हैं सबके नसीब ये,
तख़्त बिठाए क़रीब ये।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(अंतरा 1)
देखो रे शोभा क्या फूलों के जाल की,
साईं जी की निकली है पालकी।
जो "जय साईं, जय साईं" बोलते,
ये साईं उनके किस्मत के दरवाज़े खोलते।
जो करता है सेवा,
मिले रहमत का मेवा।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(पुनरावृत्ति)
साईं साईं बोल — जय जय साईं बोल,
जय साईं बोल — तेरा चाँदनी का मोर।
जय हो साईं साईं, जय हो साईं जय हो,
जय हो साईं साईं, जय हो साईं जय हो...
(अंतरा 2)
हो साईं महादानी, साईं शहनशाह — जय हो,
साईं को न जाना देना मन से — जय साईं।
साईं तो हैं प्रेम के भूखे — जय हो,
उन्हें न रिझाये कोई धन से — जय साईं।
भक्तों के बस में रहते — जय हो,
ये हैं दुश्मन अभिमान के — जय साईं।
सबकी है इनको ख़बर रे — जय हो,
सपने हैं क्या इंसान के — जय साईं।
बोलो बोलो साईं की जय बोलो,
ना तुम डोलो — बोलो रे!
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(अंतरा 3)
ओ पालकी में जो बैठी है हस्ती — जय हो,
वो ही हम सबको है पालती — जय साईं।
नित नये करामत करके — जय हो,
अपनी मुरादों को सँभालती — जय साईं।
देखने में लगता फ़क़ीर जो — जय हो,
दुनिया का वो सुल्तान है — जय साईं।
हम तो बहकते भटकते — जय हो,
वो ही हमारा निगेहबान है — जय साईं।
बोलो बोलो साईं की जय बोलो,
ना तुम डोलो — बोलो रे!
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
(पुनरावृत्ति / समापन)
साईं की निकली है पालकी,
देखो रे — छवि है जिसकी कमाल की।
जो भावना से काँधों पे इसको उठायेंगे,
वो अपने मनोरथ पूरे कर जायेंगे।
पलटे हैं सबके नसीब ये,
तख़्त बिठाए क़रीब ये।
जो "जय साईं, जय साईं" बोलते,
ये साईं उनके किस्मत के दरवाज़े खोलते।
जो करता है सेवा,
मिले रहमत का मेवा।
साईं मेरे दीनबंधु,
साईं मेरे करुणासिंधु...
Sai Ki Nikli Hai Palki | Babul Supriyo, Chandana Dixit | Sai Baba Ke Bhajan | Sai Palki Bhajan
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Song Name: Sai Ki Nikli Hai Palki
Album: Sai Ki Nikli Hai Palki
Singers: Babul Supriyo, Chandana Dixit
Music Director: Anand-Milind
Lyrics: Balbir Nirdosh
Album: Sai Ki Nikli Hai Palki
Singers: Babul Supriyo, Chandana Dixit
Music Director: Anand-Milind
Lyrics: Balbir Nirdosh
प्रभु की कृपा का वह पवित्र आगमन, जो उनकी पालकी के रूप में प्रकट होता है, भक्तों के हृदय में एक अनुपम शोभा और आनंद का संचार करता है। यह वह दैवीय छवि है, जो हर भक्त के मन को अपनी ओर खींचती है और उसे श्रद्धा से उनकी सेवा में लीन होने की प्रेरणा देती है। जो भक्त सच्चे भाव से प्रभु की पालकी को कंधे पर उठाता है, उसका हर मनोरथ उनकी कृपा से पूर्ण हो जाता है।
प्रभु का स्वरूप वह महादानी और करुणासिंधु है, जो प्रेम के भूखे हैं और भक्तों के सच्चे भाव से रीझते हैं। वह सांसारिक धन-वैभव से नहीं, बल्कि भक्तों की श्रद्धा और सेवा से प्रसन्न होते हैं। उनकी कृपा हर भक्त की खबर रखती है, उसके सपनों को जानती है और उसे भटकने से बचाकर सही मार्ग दिखाती है। वह फकीर के वेश में सृष्टि का सुल्तान है, जो हर भक्त को अपनी कृपा की छाया में पालता है और उसके जीवन को नित नए करामातों से संवारता है।
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Author - Saroj Jangir
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