जय शंकर स्तोत्र जानिये अर्थ और महात्म्य

जय शंकर स्तोत्र जानिये अर्थ और महात्म्य

जय शंकर पार्वतीपते,
मृडशम्भो शशिखण्डमण्डन,
मदनान्तक भक्तवत्सल,
प्रियकैलास दयासुधांबुधे।

सदुपायकथास्वपण्डितो,
हृदये दुःखशरेण खण्डितः,
शशिखण्डशिखण्डमण्डनं,
शरणं यामि शरण्यमीश्वरम्।

महतः परितःप्रसर्पतः,
तमसो दर्शनभेदिनो भिदे,
दिननाथ इव स्वतेजसा,
हृदयव्योम्नि मनागुदेहि नः।

ना वयं तव चर्मचक्षुषा,
पदवीमप्युपवीक्षितुं क्षमाः,
कृपयाऽभयदेन चक्षुषा,
सकलेनेश विलोकयाशु माम्।

त्वदनुस्मृतिरेव पावनी,
स्तुतियुक्ता न हि वाक्तुमीश सा,
मधुरं हि पयः स्वभावतो,
ननु कीदृक् सितशर्करयान्वितम्।

सविषोप्यमृतायते भवान्,
शवमुण्डाभरणोऽपि पावनः,
भव एव भवान्तकस्सतां,
समदृष्टिर्विषमेक्षणॊपि सन्।

अपि शूलधरो निरामयो,
दृढवैराग्यधरोऽपि रागवान्,
अपि भैक्षचरो महेश्वरश्चरितं,
चित्रमिदं हि ते प्रभो।

वितरत्यभिवाञ्छितं दृशा,
परिदृष्टः किल कल्पपादपः,
हृदये स्मृत एव धीयते,
नमतेऽभिष्टफलप्रदो भवान्।

 सहसैव भुजंगपाशवान्,
विनिगृह्णाति न यावदन्तकः,
अभयं कुत तावदाशु मे,
गतजीवस्य पुनः किमौषधैः।

सविषैरिव,
भीमपन्नगैर्विषयैरेभिरलं,
परिक्षतं,
अमृतैरिव संभ्रमेण,
मामभिषिञ्चाशु दयावलोकनैः।

मुनयो बहवोऽत्र धन्यतां,
गमिता स्वाभिमतार्थदर्शिनः,
करुणाकर येन तेन मामवसन्नं,
ननु पश्य चक्षुषा।

प्रणमाम्यथ यामि चापरं,
शरणं कं कृपणाभयप्रदम्,
विरहीव विभो प्रियामयं,
परिपश्यामि भवन्मयं जगत्।

बहवो भवतानुकंपिताः,
किमितीशान न मानुकंपसे,
दधता किमु मन्दराचलं,
परमाणुः कमठेन दुर्धरः।

अशुचिर्यदिमाऽनुमन्यसे,
किमिदं मूर्ध्नि कपालदाम ते,
उत शाठ्यमसाधुसंगिनं,
विषलक्ष्मासि न किं द्विजिह्वधृक्।

क्व दृशं विदधामि किं,
करोम्यनुतिष्ठामि कथं भयाकुलः,
क्वनु तिष्ठसि रक्षरक्षमामयि,
शम्भो शरणागतोऽस्मि ते।

विलुठाम्यवनौ किमाकुलः,
किमुरोहन्मि शिरः छिनद्मि वा,
किमु रोदिमि रारटीमि किं,
कृपणं मां न यदीक्षसे प्रभो।

शिव सर्वग शिव शर्मद,
प्रणतो देव दयां कुरुष्व मे,
नम ईश्वर नाथ दिक्पते,
पुनरेवेश नमो नमोऽस्तु ते।

शरणं तरुणेन्दुशेखर शरणं,
मे गिरिराजकन्यका,
शरणं पुनरेव तावुभौ शरणं,
नान्यदवैमि दैवतम्।

उपमन्युकृतं स्तवोत्तमं,
जपतश्शंभुसमीपवर्तिः।
अभिवाञ्छितभाग्यसंपदः,
परमायुः प्रददाति शंकरः।

उपमन्युकृतं स्तवोत्तमं,
प्रजपेद्यस्तु शिवस्य सन्निधौ,
शिवलोकमवाप्य सोऽचिरात्,
सह तेनैव शेवेन मोदते।

जय शंकर स्तोत्र , हिंदी अर्थ के साथ । Jay Shankar Stotra With Meaning

यह स्तोत्र भगवान् शंकर—पार्वतीपति—की भक्ति और शरणागति की प्रार्थना है। इसमें भक्त अपने हृदय के दुःख, भय और पाप का वर्णन कर के भगवान् से करुणा, दृष्टि और रक्षण की याचना करता है। स्तोत्र में शिव के अनेक नाम और गुण—मृडशम्भु, शशिखण्डमण्डन, मदनान्तक, भक्तवत्सल इत्यादि—उल्लेख कर उनके तेज, दयालुता और अज्ञानतामोह दूर करने वाली शक्ति का बखान है। बार-बार यह भाव आता है कि केवल शिव-स्मृति और उनके प्रति श्रद्धापूर्ण स्तुति ही मन को पवित्र करती है और जीव को विष, मृत्यु तथा संसारिक बाधाओं से मुक्ति दिलाने में समर्थ है।

इस स्तोत्र का महात्म्य यह है कि सत्य शरणागति और अध्यात्मिक स्मृति से भक्त को आतंरिक शान्ति, संकटनिवारण और इच्छित फल प्राप्त होते हैं; पारंपरिक मान्यता के अनुसार नियमित जप-पाठ से दीर्घायु, भाग्य-प्रसादन और अन्ततः शिवलोक की प्राप्ति भी संभव है। इसलिए इसे शुद्ध मन से प्रतिदिन सुबह या संध्या में पढ़ने, ध्यान या नमस्कार से पूर्व स्मरण करने की सलाह दी जाती है—जिससे विश्वास, संयम और आध्यात्मिक उन्नति होती है। 

Lata Creation Presents 
♪ Album : SHIV STOTRA
♪ Song : JAY SHANKAR STOTRA
♪ Singer : HEMANT JOSHI
♪ Producer : SHAILESH DAVE
♪ Lyrics : Traditional 
♪ Music : DR.UTPAL JIVRAJANI 

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