शंकर दयालु दूसरा तुमसा कोई नहीं शिव भजन

शंकर दयालु दूसरा तुमसा कोई नहीं शिव भजन

शंकर दयालु दूसरा,
तुमसा कोई नहीं,
देने से पहले तू जरा,
क्यों सोचता नहीं,
शंकर दयालु दुसरा,
तुमसा कोई नहीं।

भस्मासुर ने भक्ति से,
तुझको रिझा लिया,
वरदान भस्म करने का,
दानव ने पा लिया,
तुझको ही भस्म करने की,
पापी ने ठान ली,
देने से पहले तू जरा,
क्यों सोचता नहीं,
शंकर दयालु दुसरा,
तुमसा कोई नहीं।

गिरिजा की जिद पे था बना,
सोने का वो महल,
मोहरत कराने आया था,
रावण पिता के संग,
सोने की लंका दुष्ट की,
झोली में डाल दी,
देने से पहले तू जरा,
क्यों सोचता नहीं,
शंकर दयालु दुसरा,
तुमसा कोई नहीं।

मंथन की गाथा क्या कहे,
क्या क्या नहीं हुआ,
अमृत पिलाया देवों को,
और विष तू पी गया,
देवों का देव हर्ष तू,
दुनिया ये जानती,
देने से पहले तू जरा,
क्यों सोचता नहीं,
शंकर दयालु दुसरा,
तुमसा कोई नहीं।

शंकर दयालु दूसरा,
तुमसा कोई नहीं,
देने से पहले तू जरा,
क्यों सोचता नहीं,
शंकर दयालु दुसरा,
तुमसा कोई नहीं।


शंकर दयालु दूसरा तुमसा कोई नहीं || Shankar Dayalu Dusra Tumsa Koi Nahi || Upasana Mehta |bhajan

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Shankar Dayalu Doosra Tumsa Koi Nahi · Upasana Mehta
Shankar Dayalu Doosra Tumsa Koi Nahi
℗ 2025 Bhakti Sadhna
Released on: 2025-01-14
Composer: Binny Narang
Lyricist: Harsh Ji
Auto-generated by YouTube. 

शंकर की दयालुता वाली बात सीधी दिल में उतर जाती है—तुम्हारे जैसा और कोई देने वाला नहीं, लेकिन यही बात इस तरह कही जाती है कि ऐसा लगता है मानो किसी बेटे ने अपने बाबा से फिर से समझाना शुरू कर दिया हो: “देने से पहले थोड़ा सोच भी लिया करो, तुम इतनी दया दिखाते हो कि बुरे लोग भी बहक जाते हैं।” भस्मासुर की कहानी यही दिखाती है कि भक्ति का नाटक जब असली प्रेम में बदल जाए, तो भी देने वाले को चुनौती आ जाती है—किसी ने भक्ति के नाम पर ऐसा वरदान मांगा कि वही तुम्हें भस्म कर देगा, और फिर भी तुमने तत्काल दे दिया।

गिरिजा की ज़िद पर बना सोने का महल, रावण और उसके पिता की घमंडी लंका, मंथन सागर से निकला अमृत और पीया हुआ विष—ये सब इस बात की गवाही देते हैं कि तुम सबके लिए आगे आते हो, खुद से पहले दूसरों की ज़रूरत देखते हो। लेकिन यही भाव थोड़े से मज़ाक‑मिश्रित टोक बन जाता है कि “इतनी दया दिखाओ, इतना बलिदान दो, लेकिन देने से पहले हल्की सी सोच भी लिया करो, क्योंकि इस दुनिया में लोग वफ़ादार भी होते हैं और धोखेबाज़ भी।” यही बात आख़िर तक चलती है: शंकर दयालु हैं, दुनिया यह जानती है, लेकिन फिर भी उनसे सुन्दर‑सी फिरारी बात यह रहती है कि अपनी दयालुता की सीमा खुद ही निर्धारित कर लो, क्योंकि तुमसा कोई दूसरा नहीं है। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री शंकर जी की। 

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