झूला झूल रही जगदंबे झुलावे भोले भंडारी

झूला झूल रही जगदंबे झुलावे भोले भंडारी भजन

झुलावे भोले भंडारी,
झुलावे भोले भंडारी,
झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी।

पार्वती बोली शंकर से,
या अर्जी म्हारी,
सावन की ऋतु आई,
सदाशिव छाई घटा काली,
सदाशिव छाई घटा काली,
झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी।

राधा के संग झूला झूले,
झूले बनवारी,
तुम तो नाथ कभी नहीं,
झूले भोले भंडारी,
सदाशिव भोले भंडारी,
झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी।

सर्पों की प्रभु डोर बढ़ाई,
कल्पवृक्ष डारी,
इस झूले पर झूले भवानी,
जाऊं बलिहारी,
सदाशिव जाऊं बलिहारी,
झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी।

सब सखियों की या अर्जी है,
सुनियो त्रिपुरारी,
सब सखियों की या अर्जी है,
सुनियो त्रिपुरारी,
नैया हमारी बीच भंवर मे,
पार करो म्हारी,
सदाशिव पार करो म्हारी,
झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी।

झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी,
झुलावे भोले भंडारी,
झुलावे भोले भंडारी,
झूला झूल रही जगदंबे,
झुलावे भोले भंडारी।

श्रावण मास में शंकर भगवान का भजन भजन संख्या 302 झूला झूल रही जगदंबे झू लावे भोले भंडारी।

सावन की काली घटाओं के नीचे जब मन झूला झूलने को बेचैन हो जाता है, तो भोलेनाथ का साथ ही सबसे बड़ा सहारा बनता है। पार्वती जी की तरह हम भी कहते हैं, "हे शंकर, ये मौसम तो आया ही है, अब तो झूला झुला लो।" सर्पों से बनी डोर और कल्पवृक्ष की डाल पर बैठी मां भवानी का स्वरूप देखकर मन भर आता है। जीवन की हर थोड़ी सी खुशी में भी ये दृश्य हमें याद दिलाते हैं कि दयालु स्वामी का आशीर्वाद मिले तो सारी दुनिया खिल उठती है। जैसे राधा-कृष्ण की लीला में झूला झूलते हुए प्रेम की लहर दौड़ जाती है, वैसे ही भंडारी का प्यार हर दिल को झुला देता है।

सखियों की अर्जी सुनकर त्रिपुरारी का मन पिघल जाता है, कहते हैं, "अरे भवानी, नाव बीच भंवर में अटकी है, पार तो करा दो।" ये पल हमें सिखाते हैं कि भक्ति में डूबकर ही जीवन के तूफानों को पार किया जा सकता है। हर बार जब मन उदास होता है, भोले बाबा के चरणों में झुककर शांति मिलती है, जैसे कोई मां अपने बच्चे को गोद में लेकर झुलाती है। इस लीला से जुड़ाव इतना गहरा हो जाता है कि सारी थकान मिट जाती है। आखिर ये प्यार ही तो है जो हमें बार-बार बुलाता है, दिल कहता है बस अब तो यहीं रह लूं, हर सांस में बस उसी का नाम गूंजे। 

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