नील सरस्वती स्तोत्र अर्थ महात्म्य

नील सरस्वती स्तोत्र अर्थ महात्म्य


घोररूपे महारावे सर्वशत्रुभयङ्करि,
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम्।

ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्धगन्धर्वसेविते,
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणागतम्।

जटाजूटसमायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणि,
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणागतम्।

सौम्यक्रोधधरे रुपे चण्डरूपे नमोऽस्तु ते,
सृष्टिरुपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणागतम्।

जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला,
मूढ़तां हर मे देवि त्राहि मां शरणागतम्।

वं ह्रूं ह्रूं कामये देवि बलिहोमप्रिये नमः,
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम्।

बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे,
मूढ़त्वं च हरेद्देवि त्राहि मां शरणागतम्।

इन्द्रादिविलसद्द्वन्द्ववन्दिते करुणामयि,
तारे ताराधिनाथास्ये त्राहि मां शरणागतम्।

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां यः पठेन्नरः,
षण्मासैः सिद्धिमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।

मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम्,
विद्यार्थी लभते विद्यां तर्कव्याकरणादिकम्।

इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयाऽन्वितः,
तस्य शत्रुः क्षयं याति महाप्रज्ञा प्रजायते।

पीडायां वापि संग्रामे जाड्ये दाने तथा भये,
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशयः।
इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनिमुद्रां प्रदर्शयेत्।
नील सरस्वती स्तोत्र सम्पूर्णम।

अर्थ
भयानक रूपवाली,
घोर निनाद करनेवाली,
सभी शत्रुओं को भयभीत,
करनेवाली तथा भक्तों को,
वर प्रदान करनेवाली हे देवी,
आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
देव तथा दानवों के द्वारा पूजित,
सिद्धों तथा गन्धर्वों के द्वारा,
सेवित और जड़ता तथा,
पाप को हरनेवाली हे देवी,
आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
जटाजूट से सुशोभित,
चंचल जिह्वा को अंदर की,
ओर करनेवाली,
बुद्धि को तीक्ष्ण,
बनानेवाली हे देवी,
आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
सौम्य क्रोध धारण करनेवाली,
उत्तम विग्रहवाली,
प्रचण्ड स्वरूपवाली हे देवी,
आपको नमस्कार है,
हे सृष्टिस्वरुपिणि,
आपको नमस्कार है,
मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
आप मूर्खों की मूर्खता का,
नाश करती हैं और भक्तों के लिये,
भक्तवत्सला है,
हे देवी आप मेरी मूढ़ता को हरें,
और मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
वं ह्रूं ह्रूं बीजमन्त्रस्वरूपिणी हे देवी,
मैं आपके दर्शन की कामना करता हूँ,
बलि तथा होम से प्रसन्न होनेवाली,
हे देवी आपको नमस्कार है,
उग्र आपदाओं से तारनेवाली,
हे उग्रतारे आपको नित्य नमस्कार है,
आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
हे देवी आप मुझे बुद्धि दें,
कीर्ति दें कवित्वशक्ति दें,
और मेरी मूढ़ता का नाश करें,
आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
इन्द्र आदि के द्वारा वन्दित,
शोभायुक्त चरणयुगल वाली,
करुणा से परिपूर्ण,
चन्द्रमा के समान,
मुखमण्डलवाली और जगत को,
तारनेवाली हे भगवती तारा,
आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

अर्थ
जो मनुष्य अष्टमी नवमी तथा,
चतुर्दशी तिथि को इस स्तोत्र का,
पाठ करता है,
वह छ महीने में सिद्धि प्राप्त,
कर लेता है,
इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।

अर्थ
इसका पाठ करने से मोक्ष की,
कामना करनेवाला मोक्ष,
प्राप्त कर लेता है,
धन चाहनेवाला धन पा जाता है,
और विद्या चाहनेवाला विद्या,
तथा तर्क व्याकरण आदि का,
ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

अर्थ
जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर,
सतत इस स्तोत्र का पाठ करता है,
उसके शत्रु का नाश हो जाता है,
और उसमें महान बुद्धि का,
उदय हो जाता है।

अर्थ
जो व्यक्ति विपत्ति में संग्राम में,
मूर्खत्व की दशा में,
दान के समय तथा भय की,
स्थिति में इस स्तोत्र को पढ़ता है,
उसका कल्याण हो जाता है,
इसमें संदेह नहीं है।

अर्थ
इस प्रकार स्तुति करने के,
अनन्तर देवी को प्रणाम करके,
उन्हें योनिमुद्रा दिखानी चाहिए।
नील सरस्वती स्तोत्र सम्पूर्णम्।

Neel Saraswati Stotram | नील सरस्वती स्तोत्रम् | बुध्दी शक्ती कला प्रदान करनेवाला स्तोत्र #saraswati

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नील सरस्वती स्तोत्र एक शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है, जो देवी सरस्वती के उग्र रूप नील सरस्वती (नीली सरस्वती या तारा देवी के रूप में) को समर्पित है। यह दस महाविद्याओं में से एक तारा के भयंकर स्वरूप से जुड़ा हुआ है। नील सरस्वती को नीले वर्ण वाली, घोर रूप वाली, शत्रु-नाशक और बुद्धि-विद्या प्रदान करने वाली माना जाता है।
इसका पाठ शत्रु नाश, बुद्धि तेज करने, विद्या प्राप्ति, जड़ता/मूढ़ता दूर करने और विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।
स्तोत्र का महात्म्य (फलश्रुति / महत्व)
नील सरस्वती स्तोत्र का महात्म्य (benefits/phala) स्तोत्र के अंतिम श्लोकों में ही वर्णित है, जो फलश्रुति के रूप में आता है:
अष्टमी, नवमी या चतुर्दशी तिथि पर इसका पाठ करने से 6 महीने में सिद्धि प्राप्त हो जाती है (कोई संदेह नहीं)।
मोक्ष की इच्छा वाले को मोक्ष, धन की इच्छा वाले को धन, विद्या की इच्छा वाले को विद्या (विशेषकर तर्क, व्याकरण आदि शास्त्रों का ज्ञान) मिलता है।
नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने से शत्रुओं का नाश होता है और महान प्रज्ञा (उच्च बुद्धि) का उदय होता है।
पीड़ा, संग्राम (युद्ध/संघर्ष), जड़ता/मूढ़ता, दान के समय या भय की स्थिति में इसका पाठ करने से शुभ फल प्राप्त होता है, कल्याण होता है।
यह जड़ता, पाप, मूढ़ता हरने, बुद्धि, यश, कवित्व देने वाला है।
विशेष रूप से विद्यार्थियों, लेखकों, वक्ताओं, परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए लाभकारी माना जाता है। यह स्मरण शक्ति बढ़ाता है, नकारात्मकता दूर करता है और शत्रु बाधा से रक्षा करता है।
तंत्र शास्त्र में इसे बहुत शक्तिशाली माना जाता है, इसलिए तांत्रिक विधि से साधना की जाती है (जैसे योनिमुद्रा दिखाना आदि)।

देवी को घोर, भयंकर, शत्रु-भयंकर लेकिन भक्तों पर दयालु बताया गया है।
वे सुर-असुर पूजित, जड़ता-पाप हरण करने वाली, बुद्धि तेज करने वाली हैं।
जटाजूट, लोल जिह्वा (चंचल जीभ) वाली, उग्र तारा रूप में वर्णित।
बीज मंत्र जैसे वं ह्रूं ह्रूं से जुड़ी, बलि-होम प्रिय।
अंत में इन्द्र आदि देवताओं द्वारा वंदित, करुणामयी तारा के रूप में प्रार्थना।
पाठ के बाद प्रणाम कर योनिमुद्रा दिखानी चाहिए (तांत्रिक परंपरा के अनुसार)।
यह स्तोत्र बहुत प्रभावी है, लेकिन इसे श्रद्धा, शुद्धता और नियम से पढ़ें। यदि संभव हो तो गुरु दीक्षा लेकर या किसी विद्वान की देखरेख में साधना करें, क्योंकि यह तांत्रिक स्वरूप है।

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