हो थाकी मूरत प्यारी घणी लागे म्हानै विश्वकर्मा
हो थाकी मूरत प्यारी घणी लागे म्हानै विश्वकर्मा जी भगवान
सर्व कला में निपुण जो, रचयिता जगत के महान,
वंदन उनको बार-बार, श्री विश्वकर्मा भगवान।।
थारी मूरत प्यारी घणी लागे,
म्हानै विश्वकर्मा जी दातार,
विश्वकर्मा महाराज, म्हारा चारभुजा रा सरकार।।
सोने चांदी सूं शिल्प रचायो, गढ़्या स्वर्ग रा द्वार,
थारा जतन सूं जग चमक्यो, थारा हुकम अपार।।
शंभु के आग्रह पे, आपने लंका दी थी बनाए,
लंका दी थी बनाए, अपने हीरा-मोती जड़ाए।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हानै विश्वकर्मा जी महाराज।।
कृष्ण कन्हैया के आग्रह पर, द्वारिका दिन्ही बनाए,
द्वारिका दिन्ही बनाए, जिम सोना-चांदी जड़ाए।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हारा विश्वकर्मा दातार।।
विजयनगर में थानकों मंदिर बनायो,
थे हो पुष्कर राज दाता, ओ थे हो पुष्कर राज।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हानै विश्वकर्मा जी महाराज।।
कीजो आपको भजन बनायो, गावै है हर बार,
सब भक्ता की लाज राखजो, करजो भाव सों पार।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हारा विश्वकर्मा दातार।।
वंदन उनको बार-बार, श्री विश्वकर्मा भगवान।।
थारी मूरत प्यारी घणी लागे,
म्हानै विश्वकर्मा जी दातार,
विश्वकर्मा महाराज, म्हारा चारभुजा रा सरकार।।
सोने चांदी सूं शिल्प रचायो, गढ़्या स्वर्ग रा द्वार,
थारा जतन सूं जग चमक्यो, थारा हुकम अपार।।
शंभु के आग्रह पे, आपने लंका दी थी बनाए,
लंका दी थी बनाए, अपने हीरा-मोती जड़ाए।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हानै विश्वकर्मा जी महाराज।।
कृष्ण कन्हैया के आग्रह पर, द्वारिका दिन्ही बनाए,
द्वारिका दिन्ही बनाए, जिम सोना-चांदी जड़ाए।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हारा विश्वकर्मा दातार।।
विजयनगर में थानकों मंदिर बनायो,
थे हो पुष्कर राज दाता, ओ थे हो पुष्कर राज।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हानै विश्वकर्मा जी महाराज।।
कीजो आपको भजन बनायो, गावै है हर बार,
सब भक्ता की लाज राखजो, करजो भाव सों पार।
थारी मूरत प्यारी लागे, म्हारा विश्वकर्मा दातार।।
विश्वकर्मा जी नया भजन 2025।। थाकी सूरत प्यारी लागे म्हारा विश्वकर्मा लेखक,गायक: नवीन जांगिड़ किंजा
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यह भजन मैंने स्वयं लिखा, गाया और रिकॉर्ड किया है। विश्वकर्मा जी की कृपा से यह भजन आपके दिल को छू जाएगा। भजन का उद्देश्य है – भक्ति, आस्था और संस्कृति को आगे बढ़ाना। अगर आपको पसंद आए तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करें।
विश्वकर्मा भगवान शिल्पकला और सृजन के देवता माने जाते हैं। वे केवल स्थापत्य और निर्माण के आदि गुरु ही नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक अलंकरण के मूल स्त्रोत हैं। स्वर्गलोक से लेकर द्वारिका और लंका जैसे नगरों तक की रचना में उनकी शिल्पविद्या का अद्भुत वैभव झलकता है। उनके द्वारा रचा गया हर संरचनात्मक कार्य केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसमें धैर्य, शक्ति और भव्यता की संपूर्ण झलक मिलती है। यही कारण है कि उन्हें देवों का शिल्पी और कर्मयोग का प्रतीक कहा गया है। उनके चार भुजाओं में धरे शस्त्र-शिल्प इस तथ्य के प्रतीक हैं कि संसार की उन्नति सृजनशीलता और परिश्रम के आधार पर होती है।
विश्वकर्मा का स्मरण केवल स्थापत्य कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि हर क्रिया में सृजन और परोपकार का भाव होना चाहिए। जब हम उनके द्वारा निर्मित द्वारिका, लंका या मंदिरों की दिव्यता देखते हैं, तो यह केवल अद्वितीय कारीगरी का प्रमाण नहीं, बल्कि उस दिव्य चैतन्य का प्रगटीकरण है जो श्रम और साधना को परमात्मा की आराधना में परिणत करता है। उनकी उपासना करके मन में यही शक्ति जागृत होती है कि प्रत्येक कार्य को श्रम-योग और समाज कल्याण की भावना से किया जाए। इस प्रकार विश्वकर्मा केवल देव शिल्पी ही नहीं, बल्कि सृजन, श्रम और कला के माध्यम से समाज के उत्थान के ईश्वर स्वरूप आदर्श बनकर पूजे जाते हैं।
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विश्वकर्मा का स्मरण केवल स्थापत्य कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि हर क्रिया में सृजन और परोपकार का भाव होना चाहिए। जब हम उनके द्वारा निर्मित द्वारिका, लंका या मंदिरों की दिव्यता देखते हैं, तो यह केवल अद्वितीय कारीगरी का प्रमाण नहीं, बल्कि उस दिव्य चैतन्य का प्रगटीकरण है जो श्रम और साधना को परमात्मा की आराधना में परिणत करता है। उनकी उपासना करके मन में यही शक्ति जागृत होती है कि प्रत्येक कार्य को श्रम-योग और समाज कल्याण की भावना से किया जाए। इस प्रकार विश्वकर्मा केवल देव शिल्पी ही नहीं, बल्कि सृजन, श्रम और कला के माध्यम से समाज के उत्थान के ईश्वर स्वरूप आदर्श बनकर पूजे जाते हैं।
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Admin - Saroj Jangir
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