जो वृंदावन में आए नहीं मोहन का ठिकाना क्या

जो वृंदावन में आए नहीं मोहन का ठिकाना क्या

 
जो वृंदावन में आए नहीं मोहन का ठिकाना क्या

जो वृंदावन में आए नहीं,
मोहन का ठिकाना क्या जाने।
जो इन गलियों में आए नहीं,
मेरे श्याम को पाना क्या जाने।।

प्रेम गली अति सांकरी है,
कैसे मिलना हो मोहन से।
जो मोहन को दिल में बसाया नहीं,
वो दिल का लगाना क्या जाने।।
जो इन गलियों में आए नहीं,
मेरे श्याम को पाना क्या जाने।।

वृंदावन की इन गलियों में,
श्यामा के चरण पड़े तो होंगे।
और श्याम भी यहीं चले होंगे,
जिसने कभी प्रेम से पुकारा नहीं,
मेरे श्याम का आना क्या जाने।।
जो इन गलियों में आए नहीं,
मेरे श्याम को पाना क्या जाने।।

विष अमृत सा मीरा पी गई,
श्याम दीवानी मीरा जी गई।
मीरा सा कोई अमृत की तरह,
विष का पी जाना क्या जाने।।
जो इन गलियों में आए नहीं,
मेरे श्याम को पाना क्या जाने।।

जो वृंदावन में आए नहीं,
मोहन का ठिकाना क्या जाने।
जो इन गलियों में आए नहीं,
मेरे श्याम को पाना क्या जाने।।



Jo Vrindavan Me Aaye Nahi Mohan Ka Thikana Kya Jane

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Provided to YouTube by Madhur Films
Jo Vrindavan Me Aaye Nahi Mohan Ka Thikana Kya Jane · Singer : Prakash Tiwari Madhur
Jo Vrindavan Me Aaye Nahi Mohan Ka Thikana Kya Jane
℗ Madhur Films
Released on: 2025-09-19
Producer: Prakash Tiwari Madhur
Sound Engineer: Rajul Chaudhary
Composer: Prakash Tiwari Madhur
Lyricist: Prakash Tiwari Madhur
 
वृंदावन की पावन भूमि और उसकी गलियों का आध्यात्मिक महत्व अनन्य है, जहाँ हर कण में भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति का अहसास होता है। यह स्थान केवल भौतिक रूप से देखने या भ्रमण करने का नहीं, बल्कि हृदय की गहराइयों से अनुभव करने का है। वहाँ की गलियाँ प्रेम और भक्ति की संकरी राहों का प्रतीक हैं, जहाँ केवल वही पहुँच सकता है, जिसने अपने मन को शुद्ध प्रेम और समर्पण से सजाया हो। यह प्रेम वह नहीं, जो बाहरी दिखावे में उलझता है, बल्कि वह है, जो हृदय में ईश्वर को बसाने की साधना बन जाता है। जो इस प्रेममयी राह पर नहीं चला, वह उस दिव्य सान्निध्य को कैसे समझ सकता है, जो वृंदावन की हर गली में व्याप्त है? यह सान्निध्य केवल बाहरी यात्रा से नहीं, बल्कि आत्मिक निष्ठा और प्रेम की गहराई से प्राप्त होता है, जहाँ भक्त का हृदय स्वयं भगवान का ठिकाना बन जाता है।
 
मीरा बाई का जीवन इस प्रेम और समर्पण का जीवंत उदाहरण है, जिन्होंने संसार के विष को भी अमृत में बदल दिया। उनका प्रेम इतना गहन था कि वह न केवल भगवान को अपने हृदय में बसाने में समर्थ हुईं, बल्कि उनके लिए जीने और मरने को भी तैयार थीं। यह प्रेम साधारण नहीं, बल्कि एक ऐसी दीवानगी है, जो भक्त को संसार के भय, लोभ और बंधनों से मुक्त कर देती है। वृंदावन की गलियों में भगवान के चरणों की छाप और उनकी लीलाओं का आभास तभी अनुभव होता है, जब भक्त प्रेम से पुकारता है। यह पुकार केवल शब्दों की नहीं, बल्कि हृदय की वह तड़प है, जो भगवान को निकट लाती है। जो इस तड़प को नहीं जानता, वह उस आनंद को कैसे समझ सकता है, जो भगवान के आने और उनके साथ एक होने में है? यह प्रेम और भक्ति ही वह मार्ग है, जो भक्त को वृंदावन की गलियों से जोड़ता है और उसे ईश्वर के सच्चे ठिकाने तक ले जाता है। 
 
Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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