क्या सोचता है पागल मनवा जो बीत गया भजन

क्या सोचता है पागल मनवा जो बीत गया भजन


क्या सोचता है, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया,
इस झूठे खेल में, मूल्य ही क्या,
कोई हार गया, कोई जीत गया,
क्या सोच करे, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया।।

हम चाहें, वही हो, ज़रूरी नहीं,
आशाएँ कभी हुई, पूरी कहीं,
रे सोच तनिक, जीवन-घट का,
श्वाँसा-जल कितना, रीत गया,
क्या सोच करे, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया।।

प्रभु-प्रेम पियूष पिया जिसने,
परहित हित, जन्म लिया जिसने,
जीवन है वही, जो जन-जन के,
मृदु अधरों का, बन मीत गया,
क्या सोच करे, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया।।

जब सूर्य-सा साथी मिलता है,
राजेश कमल, तब खिलता है,
हर साँझ को, कहता है पंकज,
हम कैसे मिले, मीत गया,
क्या सोच करे, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया।।

क्या सोचता है, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया,
इस झूठे खेल में, मूल्य ही क्या,
कोई हार गया, कोई जीत गया,
क्या सोच करे, पागल मनवा,
जो बीत गया, सो बीत गया।।


क्या सोचता रे पागल मनवा - जो बीत गया सो बीत गया - राजेश्वरानंद जी महाराज भजन - राम सीता भजन

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जीवन निरंतर आगे बढ़ने का नाम है। बीते हुए समय को बार-बार याद करके मन केवल दुख और निराशा ही प्राप्त करता है, जबकि वर्तमान का प्रत्येक क्षण ईश्वर का अनमोल उपहार है। संसार में हार और जीत, सुख और दुःख, लाभ और हानि आते-जाते रहते हैं, इसलिए इन्हें अपने मन पर स्थायी स्थान नहीं देना चाहिए। सच्चा आनंद तब मिलता है जब हृदय प्रभु के प्रेम में डूबकर दूसरों के लिए करुणा, सेवा और सद्भाव का भाव अपनाता है। जो जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए जिया जाता है, वही वास्तव में सार्थक बनता है। समय निरंतर बीत रहा है और प्रत्येक श्वास हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन का उद्देश्य केवल चिंताओं में उलझना नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और सत्कर्मों से इसे सुंदर बनाना है। ईश्वर पर विश्वास रखने वाला मन अतीत के बोझ से मुक्त होकर आशा, धैर्य और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ता है तथा हर परिस्थिति में उनकी कृपा का अनुभव करता है।
 
क्या सोचता रे पागल मनवा, जो बीत गया सो बीत गया,
इस झूठे खेल में मूल्य ही क्या, कोई हार गया कोई जीत गया |
राजेश्वरानंद जी महाराज भजन - राम सीता भजन 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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