श्री कौसल्यानन्दन स्तोत्रम् अर्थ महात्म्य
श्री कौसल्यानन्दन स्तोत्रम् अर्थ महात्म्य
श्रीसीतारामस्तवादर्शः
दशरथात्मजं रामं कौसल्यानन्दवर्द्धनं,
जानकीवल्लभं वन्दे पूर्ण ब्रह्मसनातनम्।
किरीट-कुण्डलज्योत्स्ना-मञ्जुलं राघवं भजे,
धनुर्धरं सदा शान्तं सर्वदा सत्कृपाकरम्।
श्रुति-पुराण-सूत्रादि शास्त्रै र्नित्यं विवेचितम,
ऋषि-मुनीन्द्रवर्येश्च वर्णितं नौमि राघवम्।
हनुमता सदा वन्द्यं सीतया परिशोभितम,
लक्ष्मणेन समाराध्यं श्रीमद्रामं हृदा भजे।
श्रीभरताग्रजं रामं शत्रुघ्न-सेवितं भजे,
अयोध्यायां महापुर्यां शोभितं सूर्यवंशजम्।
वशिष्ठ मुनिना सार्द्ध रामं चारुविभूषितम्,
सरयूपुलिने नौमि व्रजन्तं सह सीतया।
नवीननीरदश्यामं नीलाब्जमाल्यधारिणं,
नववृन्दादलैरर्घ्यं नौमि रामं दयार्णवम्।
रसिकैः सद्भिराराध्यं महानन्दसुधाप्रदम्,
गो-विप्रपालकं रामं वन्दे श्रीरघुनन्दनम्।
ऋषीणां यागरक्षायां सर्वरूपेण तत्परम्,
वेद-वेदान्ततत्त्वज्ञं श्रीराममभिवादये।
दशानननिहन्तारं दीनानुग्रहसम्प्रदं,
अपरिमेयगाम्भीर्यं श्रीरामं प्रभजे सदा।
परात्परतरं ब्रह्म मनुजाकृति शोभनम्,
नारायणं भजे नित्यं राघवं सह सीतया।
चित्रकूटे महारण्ये मन्दाकिन्या महातटे,
सीतया शोभितं रामं लक्ष्मणसहितं भजे।
पीतकौशेयवस्त्रेण लसितं तिलकाऽङ्कितम्,
नानाऽलङ्कारशोभाऽऽढ्यं रघुनाथं स्मराम्यहम्।
विलसच्चारुचापञ्च कोटिकन्दर्पसुन्दरम्,
हनुमता सदाऽऽराध्यं नमामि नवविग्रहम्।
सागरे सेतुकारञ्च विभीषणसहायकम्,
वानरसैन्यसङ्घाते राजितं राघवं भजे।
शवरी-बदरीमञ्जुफलाऽऽस्वादनतत्परं,
वन्दे प्रमुदितं रामं दयाधाम कृपार्णवम्।
श्रीराघवं महाराजं दिव्यमङ्गलविग्रहं,
अनन्तनिर्जरैः सेव्यं भावये मुदिताननम्।
नवजलधरश्यामं श्रीदशरथनन्दनं,
अयोध्याधाम भूमध्ये शोभितमनिशं भजे।
प्रपन्नजीवनाधारं प्रपन्नभक्तवत्सलम्,
प्रपन्नाऽऽर्तिहरं रामं प्रपन्नपोषकं भजे।
अचिन्त्यरूपलावण्य-शान्ति-कान्तिमनोहरम्,
हेमकुण्डलशोभाढ्यं हृदा रामं नमाम्यहम्।
चित्र-विचित्रकौशेयाऽम्बरशोभितमीश्वरम्,
अव्ययमखिलात्मानं भजेऽहं राघवं प्रियम।
वन्यफलाऽशनाऽभ्यस्तं मन्दाकिन्या महातटे,
सीतया शोभितं रामं लक्ष्मणसंयुतं भजे।
नीलाऽरुणोत्पलाऽऽछन्ने भ्रमरावलिगुञ्जिते,
सरस्तटे समासीनं रामं राज्ञं स्मरामि तम्।
कौसल्यानन्दनं राममयोध्याधाम्नि पूजितम्,
भावये विविधैर्भक्तैर्भक्तमनोरथप्रदम्।
सुग्रीवराज्यदातारं समस्तजगदाश्रयं,
सुग्रीवराज्यदा,
असीमकरुणाशीलं नमामि राघवं मुदा।
वृन्दामाल्यधरं रामं कल्पवृक्षमभीष्टदम्,
तञ्च प्रदायकं नौमि पुरुषार्थचतुष्टयम्।
कुसुमवाटिकामध्ये पुष्पार्थं पथि राघवम्,
विहरन्तं महोदरं लक्ष्मणेन समं भजे।
क्रीडन्तं सरयूतीरे भ्रातृभिः सह पावने,
हसन्तं हासयन्तञ्च रामचन्द्रं विभावये।
राघवं परमे रम्ये प्रासादे हेमनिर्मित,
सिंहासनसमासीनं भजामि सह सीतया।
अश्वासीनं महारण्ये स्वीयपरिकरैः सह,
श्रीभरतप्रियं रामं प्रणमामि तमीश्वरम्।
दर्शनीयं महागम्यं साकेते धाम्नि शोभितम्,
अमन्दानन्दसन्दोहं श्रीरामं मधुरं भजे।
कौसल्यानन्दनस्तोत्रं भुक्ति-मुक्तिप्रदायकम्,
राधासर्वेश्वराद्येन शरणान्तेन निर्मितम्।
Ath Shree Kaushalya Nandan Stotram | श्री कौसल्यानन्दन स्तोत्रम् | Shree Ram Stotram With Lyrics
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दशरथात्मजं रामं कौसल्यानन्दवर्द्धनं।
जानकीवल्लभं वन्दे पूर्णं ब्रह्मसनातनम्॥१॥
किरीट-कुण्डलज्योत्स्ना-मञ्जुलं राघवं भजे।
धनुर्धरं सदा शान्तं सर्वदा सत्कृपाकरम्॥२॥
अर्थ: यहाँ भगवान श्रीराम को दशरथ के पुत्र, माता कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाले, जानकी (सीता) के प्रियतम और पूर्ण सनातन परब्रह्म के रूप में वंदन किया गया है। वे आदि-अनादि परमात्मा हैं जो मनुष्य रूप में अवतरित हुए हैं। दूसरे श्लोक में उनके किरीट और कुंडलों की ज्योत्स्ना जैसी चमक से युक्त मनोहर रूप की स्तुति है। वे धनुष धारण करने वाले, सदैव शांत स्वभाव वाले और सभी पर निरंतर सच्ची कृपा बरसाने वाले रघुवंशी हैं, जिनकी भक्ति से भक्त का हृदय आनंदित हो जाता है।
श्रुति-पुराण-सूत्रादि-शास्त्रै र्नित्यं विवेचितम्।
ऋषि-मुनीन्द्रवर्यैश्च वर्णितं नौमि राघवम्॥३॥
हनुमता सदा वन्द्यं सीतया परिशोभितम्।
लक्ष्मणेन समाराध्यं श्रीमद्रामं हृदा भजे॥४॥
अर्थ: वेद, पुराण, सूत्र आदि सभी शास्त्रों द्वारा जिनका निरंतर विवेचन और विश्लेषण किया जाता है, तथा श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों द्वारा जिनकी महिमा का वर्णन किया जाता है, उन रघुनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। हनुमान जी द्वारा सदा वंदनीय, सीता जी से सुशोभित और लक्ष्मण जी द्वारा पूजित श्रीराम को मैं हृदय से भजता हूँ। यह श्लोक राम के शास्त्रों में वर्णित परमात्मा स्वरूप और उनके प्रिय भक्तों (हनुमान, सीता, लक्ष्मण) के साथ संबंध को दर्शाता है।
श्रीभरताग्रजं रामं शत्रुघ्न-सेवितं भजे।
अयोध्यायां महापुर्यां शोभितं सूर्यवंशजम्॥५॥
वशिष्ठ मुनिना सार्द्ध रामं चारुविभूषितम्।
सरयूपुलिने नौमि व्रजन्तं सह सीतया॥६॥
अर्थ: भरत के बड़े भाई, शत्रुघ्न द्वारा सेवित, अयोध्या महानगरी में सुशोभित और सूर्यवंश में जन्मे श्रीराम की भक्ति करता हूँ। वशिष्ठ मुनि के साथ, सीता जी सहित सरयू नदी के तट पर सुन्दर रूप से विभूषित होकर विचरण करने वाले राम को मैं नमस्कार करता हूँ। यहाँ राम के राजसी और पारिवारिक रूप का सुन्दर चित्रण है।
नवीननीरदश्यामं नीलाब्जमाल्यधारिणं।
नववृन्दादलैरर्घ्यं नौमि रामं दयार्णवम्॥७॥
रसिकैः सद्भिराराध्यं महानन्दसुधाप्रदम्।
गो-विप्रपालकं रामं वन्दे श्रीरघुनन्दनम्॥८॥
अर्थ:नवीन मेघ जैसे श्याम वर्ण वाले, नील कमल की माला धारण करने वाले, नवीन वृंदा (तुलसी) के पत्तों से अर्घ्य प्राप्त करने वाले दया के सागर श्रीराम को नमस्कार करता हूँ। रसिक साधकों द्वारा आराधित, महान आनंद की अमृत प्रदान करने वाले, गायों और ब्राह्मणों के रक्षक श्रीरघुनंदन की वंदना करता हूँ। यह श्लोक राम के श्याम सुन्दर रूप और भक्तों को आनंद देने वाले स्वभाव का वर्णन करता है।
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