तेरी जटा से बहती गंगा है तेरे माथे पे सजता

तेरी जटा से बहती गंगा है तेरे माथे पे सजता चन्दा है


तेरी जटा से बहती गंगा है,
तेरे माथे पे सजता चन्दा है,
तेरी महिमा को ना जानता हो,
इस धरा पे ना कोई बंदा है।

गुणगान में जितना करता हूं,
मुझे उतना ही बाबा कम लगता है,
हे महादेव,
हे महादेव,
मेरा तेरे सिवा किसी और,
जगह ना मन लगता,
मेरे महादेव मेरा तेरे सिवा,
किसी और जगह ना मन लगता।

शिव शंकर भोलेनाथ,
मेरे शंभु भोलेनाथ,
शिव शंकर भोलेनाथ,
मेरे शंभु भोलेनाथ।

कुछ दिनों पहले यारों,
मैं था नास्तिक सा बंदा,
घर में बैठा था नकारा,
कोई ना था काम धंधा,
आती जाती लड़की ताड़ी,
कामवासना में अंधा,
आंखें खुली जब देना पड़ा,
पिता जी को कंधा,
पापा चले गये हमे यूं,
अकेला कर गये,
साथ खड़ा ना कोई मेरे,
सारे दोस्त डर गये,
तेरह दिन का दिखावा,
उसके बाद ना कोई दिखा,
सभी रिश्तेदार जीते जी ही,
मानो मर गये।

मरने वाले थे हालात,
होके बैठा था उदास,
मुझको हिमत देने वाला,
मेरे कोई ना था पास,
भोलेनाथ आये सपने में,
तो दिखी इक आस,
नंगे पाव पहुंचा मंदिर,
मुझे उनपे था विश्वास,
भोलेनाथ मुझे ताके उनका,
चेहरा बड़ा भोला,
उनके आगे जाके रोया,
सब पैसों का था रोला,
ले पुजारी से प्रसाद,
माथे तिलक लगाया,
दिल में जो भी आया,
नंदी जी के कान में बोला।

दुख बाद सुख आता बंदा,
हार ना बस माने,
भोलेनाथ की कृपा से,
दास लिखने लगा गाने,
आज भीड़ लाखों पीछे,
कभी अपने थे बेगाने,
वो भी मारते है ताली,
जो कभी मारते थे ताने,
सब रिश्तेदार दोगले है,
जहरीले सांप,
मेरे पास ना था पैसा,
मेरा जीवन मानो श्राप,
कभी सोचता था प्रभु,
कैसा हो गया है पाप,
जीवन बदला जबसे किया,
महामृत्युंजय का जाप।

हर टूटे  हुए बंदे की है,
आस भोलेनाथ,
भोलेनाथ परम सखा सदा,
देते सबका साथ,
पंचतत्व में विलीन,
वो है स्वयं भूतनाथ,
भोलेनाथ माता पिता सबके,
कोई ना अनाथ,
त्रिनेत्र खोले शंभु होता,
पापीयों का नाश,
नीलकंठ भी कहलाते,
कंठ विष करता वास,
वो ही परम् सत्य वो ही,
अटल भक्त का विश्वास,
वो ही देह वो ही काया,
उनसे हर एक स्वांस।

भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है। देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए क्षीरसागर/समुद्र का मंथन किया। मंथन के दौरान अनेक रत्न, दिव्य वस्तुएं, और धन सम्पत्ति निकली, लेकिन उनके साथ-साथ अत्यंत विषैला हलाहल विष भी निकला। यह विष इतना घातक था कि उसकी ज्वालाओं से संपूर्ण सृष्टि जलने लगी। जब देवता और असुर इस विष की भयानकता से भयभीत हो गए तो वे भगवान शिव की शरण में गए। करुणानिधान महादेव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को स्वयं ग्रहण कर लिया लेकिन उसे अपने गले में ही रोक लिया और निगला नहीं। इस विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया, और तभी से वे नीलकंठ कहलाए। भगवान शिव का यह रूप त्याग, करुणा और कल्याण का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि बुराइयों को अपने भीतर स्थान न दें, बल्कि उन्हें नियंत्रित करें। कठिनाइयों को सहन कर दूसरों की भलाई करना ही सच्ची उदारता है। इसीलिए भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है। यह नाम उनके अद्भुत त्याग और विश्व कल्याण के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुआ। जय शिव शंकर।


Mere Mahadev | मेरे महादेव (Hindi Rap) - Ghor Sanatani Ft. ‪@shubhamusicofficial‬

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Singer ‪@shubhamusicofficial‬
Lyrical Video  Dhurv Graphics 

Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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