उसको माँ तुम निहाल करती हो

उसको माँ तुम निहाल करती हो

 
उसको माँ तुम निहाल करती हो

उसको माँ तुम निहाल करती हो,
जो भी दरबार तेरे आता है,
उसका पल-पल ख़याल करती हो,
जो तुम्हें प्यार से मनाता है,
उसको माँ तुम निहाल करती हो,
उसको माँ तुम निहाल करती हो।।

यही सुनकर के मैं भी आया हूँ,
मेरी किस्मत को भी सँवारोगी,
मैं हूँ टुकड़ा माँ काँच का टूटा,
क्या मुझे हीरे-सा निखारोगी।

उसके सब साथ है माँ,
जिस पे तेरा हाथ है माँ,
वो ना राहों में लड़खड़ाता है,
उसको माँ तुम निहाल करती हो,
उसको माँ तुम निहाल करती हो।।

झोलियाँ पड़ गई छोटी उनकी,
बन सवाली जो दर पे आए हैं,
पतझड़ों ने जिन्हें लूटा कल था,
फिर बहारों में मुस्कुराए हैं।

महकी ममता की कली,
माँ की जब ज्योत जली,
आने वाला न खाली जाता है,
उसको माँ तुम निहाल करती हो,
उसको माँ तुम निहाल करती हो।।

मैं यह वरदान माँगता हूँ माँ,
यूँ ही बस साथ तू रहे हरदम,
मैं जिधर देखूँ तू नज़र आए,
कर दे मुझ पर तू इतना करम।

मैं बुराई से बचूँ,
और तेरा नाम जपूँ,
नाम लक्ष का तुझे भाता है,
उसको माँ तुम निहाल करती हो,
उसको माँ तुम निहाल करती हो।।

उसको माँ तुम निहाल करती हो,
जो भी दरबार तेरे आता है,
उसका पल-पल ख़याल करती हो,
जो तुम्हें प्यार से मनाता है,
उसको माँ तुम निहाल करती हो,
उसको माँ तुम निहाल करती हो।।



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Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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