लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे भजन
लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे भजन
छुपाऊँ कैसे लागा, चुनरी में दाग
चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे,
घर जाऊँ कैसे
लागा, चुनरी में दाग,
हो गई मैली मोरी चुनरिया
कोरे बदन सी कोरी चुनरिया,
आ ... जाके बाबुल से,
नज़रें मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा, चुनरी में दाग ...
भूल गई सब बचन बिदा के
खो गई मैं ससुराल में आके
आ ... जाके बाबुल से,
नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा, चुनरी में दाग ...
(कोरी चुनरिया आत्मा मोरी
मैल है माया जाल,
वो दुनिया मोरे बाबुल का घर
ये दुनिया ससुराल
हाँ जाके बाबुल से,
नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा, चुनरी में दाग,
आ आ,
धीम त न न न दिर दिर तानुम
ता न देरे न
धीम त न न न दिर दिर तान,
धीम त देरे न ...
सप्त सुरन तीन ग्राम बंसी बाजी
दिर दिर तानी, ता नी नी द,
नी द प म, प म म ग
म ध ग म म ग रे स
ध ध केटे ध ध ध केटे ध ध केट ध केट
धरत पाग पड़त नयी परण
झाँझर झनके झन नन झन नन
दिर दिर त तूम त द नी,
त न न न त न न न
धीम त न न न न दिर दिर ताम,
Hemantkumar Musical Group presents Laga Chunri Mein Daag by Shurjo Bhattacharya
आत्मा की सफेद चुनरी जैसे कोरी थी, लेकिन संसार में आते ही माया का जाल लग गया। छोटे-छोटे कर्म, मोह और लोभ ने दाग लगा दिए। अब घर लौटने का मन करता है, लेकिन बाबुल के सामने नजरें कैसे मिलाएं। ससुराल में खो गई, बचपन के वचन भूल गई। मैली चुनरी लेकर कैसे वापस जाऊं, यह सोचकर मन बेचैन हो जाता है।
कोरी चुनरिया आत्मा है, मैल माया का जाल। एक दुनिया बाबुल का घर, जहां शुद्धता थी, दूसरी ये ससुराल जहां दाग लग गए। फिर भी दिल में यही उम्मीद बसी रहती है कि बाबा की कृपा से सब दाग धुल जाएंगे। बंसी की तान सुनकर, सप्त सुर और तीन ग्राम की धुन में मन थिरकने लगता है। झांझर की झनकार और मृदंग की लय याद दिलाती है कि असली घर वहीं है, जहां कोई दाग नहीं लगता। बस एक बार फिर से शुद्ध होकर लौटने की चाह जागती है।
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Author - Saroj Jangir
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