सुदर्शन चक्र चलाया उंगली पे कृष्ण भजन
सुदर्शन चक्र चलाया उंगली पे कृष्ण भजन
कैसा चक्कर चलाया उंगली पे,
धन धन हरि जी तेरी ये उंगली,
सुदर्शन चक्र चलाया उंगली पे,
सुदर्शन चक्र चलाया उंगली पे।
जदो रावण ने जुल्म कमाया सी,
सीता हर के लंका में ले आया सी,
ओदी लाज बचा लेई उंगली पे,
सारी लंका जला लेई उंगली पे,
तूने चक्र चलाया उंगली पे।
जदो द्रोपती नूं हुक्म सुनाया सी,
दुशासन लेके सभा दे विच आया सी,
उन्हें चीर बढ़ाया उंगली पे,
लक्खां चीर बढ़ाए उंगली पे,
धन धन हरि जी तेरी ये उंगली,
तूने चक्र चलाया उंगली पे।
जदो मित्र सुदामा आया सी,
तूने चावल दा भोग लगाया सी,
कंचन महल पवाए उंगली पे,
धन धन हरि तेरी ये उंगली,
तूने चक्र चलाया उंगली पे।
धन धन हरि जी तेरी ये उंगली,
सुदर्शन चक्र चलाया उंगली पे,
सुदर्शन चक्र चलाया उंगली पे।
जदो रावण ने जुल्म कमाया सी,
सीता हर के लंका में ले आया सी,
ओदी लाज बचा लेई उंगली पे,
सारी लंका जला लेई उंगली पे,
तूने चक्र चलाया उंगली पे।
जदो द्रोपती नूं हुक्म सुनाया सी,
दुशासन लेके सभा दे विच आया सी,
उन्हें चीर बढ़ाया उंगली पे,
लक्खां चीर बढ़ाए उंगली पे,
धन धन हरि जी तेरी ये उंगली,
तूने चक्र चलाया उंगली पे।
जदो मित्र सुदामा आया सी,
तूने चावल दा भोग लगाया सी,
कंचन महल पवाए उंगली पे,
धन धन हरि तेरी ये उंगली,
तूने चक्र चलाया उंगली पे।
सुदर्शन चक्र भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य अस्त्र है जो अधर्म के नाश और धर्म की रक्षा के लिए प्रयोग किया गया है। जब रावण ने माता सीता का हरण किया तब श्रीराम की शक्ति से पूरी लंका जलकर भस्म हो गई। महाभारत में द्रौपदी की लाज बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी कृपा से उसका चीर बढ़ाया। जब सुदामा श्रीकृष्ण के द्वार पर आए तो उन्होंने प्रेम पूर्वक उनके चावल ग्रहण किए और बदले में उन्हें वैभवशाली जीवन प्रदान किया। भगवान श्रीकृष्ण की उंगली पर सुदर्शन चक्र सदैव धर्म की रक्षा के लिए गतिशील रहता है। जय श्री कृष्ण।
कृष्ण भजन लिरिक्सहरि जी कैसे रक्षा करते हैं भक्तों की जरूर सुनें इस भजन मेंकंचन महल बनाया ऊंगली पे
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उंगली पर चमत्कार घड़ते हैं हरि जी, सुदर्शन चक्र घुमाकर अधर्म का नाश करते हैं। रावण के जुल्मों ने सीता को लंका खींच लिया था, फिर उसी उंगली से लाज बचाई, सारी लंका जला दी। द्रौपदी की सभा में अपमान हो रहा था, दुशासन चीर खींच रहा था, लाखों चीर उसी उंगली से बढ़ा दिए। सुदामा दो मुट्ठी चावल लेकर आए, कंचन महल उसी उंगली से पा गए। साधक देखते रह जाते हैं ये लीला।
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Author - Saroj Jangir
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