गोपाल तेरी सेवा हमसे बनी रे नंदलाल
गोपाल तेरी सेवा हमसे बनी रे नंदलाल
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे,
नंदलाल, तेरी पूजा हमसे बनी रे,
हम से ना बनी, कान्हा, हमसे बनी रे,
हम से ना बनी, लल्ला, हमसे बनी रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
कहाँ से लाऊँ माखन, कहाँ से लाऊँ मेवा,
कहाँ से लाऊँ मटकी, मैं छाज भरी रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
कहाँ से लाऊँ ललिता, कहाँ से लाऊँ विशाखा,
कहाँ से लाऊँ कान्हा, मैं राधा प्यारी रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
कहाँ से लाऊँ गोकुल, कहाँ से लाऊँ मथुरा,
कहाँ से लाऊँ कान्हा, मैं कुंज गली रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
नंदलाल, तेरी पूजा हमसे बनी रे,
हम से ना बनी, कान्हा, हमसे बनी रे,
हम से ना बनी, लल्ला, हमसे बनी रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
कहाँ से लाऊँ माखन, कहाँ से लाऊँ मेवा,
कहाँ से लाऊँ मटकी, मैं छाज भरी रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
कहाँ से लाऊँ ललिता, कहाँ से लाऊँ विशाखा,
कहाँ से लाऊँ कान्हा, मैं राधा प्यारी रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
कहाँ से लाऊँ गोकुल, कहाँ से लाऊँ मथुरा,
कहाँ से लाऊँ कान्हा, मैं कुंज गली रे।
गोपाल, तेरी सेवा हमसे बनी रे...
Gopal Teri Sewa Hamse Na Bani Re - Prem Prakash Dubey | Krishna Bhajan | Sanskar Bhajan
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Bhajan : Gopal Teri Sewa Hamse Na Bani Re
Singer : Prem Prakash Dubey
Label : Sanskar Bhajan
Singer : Prem Prakash Dubey
Label : Sanskar Bhajan
सुंदर भजन में श्रीकृष्णजी के प्रति एक गहरी आत्मीयता और समर्पण का उद्गार झलकता है, जो मानव मन की सीमाओं और अनन्य भक्ति की तीव्र लालसा को दर्शाता है। यह भाव मन को उस सत्य की ओर ले जाता है कि सच्ची सेवा बाहरी साधनों या सामग्री से नहीं, बल्कि हृदय की निर्मल भावना से पूर्ण होती है। जैसे कोई साधक अपने हृदय को श्रीकृष्णजी के चरणों में अर्पित कर देता है, वैसे ही यहाँ भक्त का मन अपनी अक्षमता को स्वीकार करते हुए भी उनकी सेवा में लीन रहने की उत्कंठा रखता है।
माखन, मेवा, मटकी या छाज जैसी भौतिक वस्तुएँ भक्ति के प्रतीक हैं, जिन्हें जुटाने की चिंता भक्त के मन में उठती है। लेकिन यह चिंता उसकी सीमित शक्ति का बोध कराती है, जो उसे और अधिक श्रीकृष्णजी की शरण में ले जाती है। यह मन का स्वाभाविक स्वर है कि जो कुछ भी अर्पित किया जाए, वह उनके प्रेम के सामने तुच्छ है। फिर भी, भक्त का हृदय यह मानता है कि प्रेम और श्रद्धा ही सच्चा अर्पण है।
ललिता, विशाखा और राधारानी का उल्लेख श्रीकृष्णजी के निकटतम सखा-सखियों के प्रति भक्त की आत्मीयता को दर्शाता है। यह भाव बताता है कि भक्ति का मार्ग केवल ईश्वर तक नहीं, बल्कि उनके प्रियजनों के प्रति भी श्रद्धा से भरा होता है। जैसे कोई विद्यार्थी अपने गुरु के साथ उनके शिष्यों के प्रति भी सम्मान रखता है, वैसे ही भक्त श्रीकृष्णजी के साथ राधारानी और गोपियों के प्रति भी प्रेम रखता है। यह समग्र भक्ति का स्वरूप है, जो एकाकी नहीं, बल्कि सामूहिक प्रेम में रमता है।
गोकुल, मथुरा और कुंज गली का उल्लेख भक्ति के उन पवित्र स्थानों को रेखांकित करता है, जो श्रीकृष्णजी की लीलाओं से जुड़े हैं। यह भाव मन को उस सत्य की ओर ले जाता है कि भक्ति किसी स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि वह हृदय में बसी एक अनुभूति है। जैसे कोई संत अपने मन को ही मंदिर मान लेता है, वैसे ही भक्त का मन श्रीकृष्णजी की लीलाओं को हर पल अपने भीतर अनुभव करता है।
माखन, मेवा, मटकी या छाज जैसी भौतिक वस्तुएँ भक्ति के प्रतीक हैं, जिन्हें जुटाने की चिंता भक्त के मन में उठती है। लेकिन यह चिंता उसकी सीमित शक्ति का बोध कराती है, जो उसे और अधिक श्रीकृष्णजी की शरण में ले जाती है। यह मन का स्वाभाविक स्वर है कि जो कुछ भी अर्पित किया जाए, वह उनके प्रेम के सामने तुच्छ है। फिर भी, भक्त का हृदय यह मानता है कि प्रेम और श्रद्धा ही सच्चा अर्पण है।
ललिता, विशाखा और राधारानी का उल्लेख श्रीकृष्णजी के निकटतम सखा-सखियों के प्रति भक्त की आत्मीयता को दर्शाता है। यह भाव बताता है कि भक्ति का मार्ग केवल ईश्वर तक नहीं, बल्कि उनके प्रियजनों के प्रति भी श्रद्धा से भरा होता है। जैसे कोई विद्यार्थी अपने गुरु के साथ उनके शिष्यों के प्रति भी सम्मान रखता है, वैसे ही भक्त श्रीकृष्णजी के साथ राधारानी और गोपियों के प्रति भी प्रेम रखता है। यह समग्र भक्ति का स्वरूप है, जो एकाकी नहीं, बल्कि सामूहिक प्रेम में रमता है।
गोकुल, मथुरा और कुंज गली का उल्लेख भक्ति के उन पवित्र स्थानों को रेखांकित करता है, जो श्रीकृष्णजी की लीलाओं से जुड़े हैं। यह भाव मन को उस सत्य की ओर ले जाता है कि भक्ति किसी स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि वह हृदय में बसी एक अनुभूति है। जैसे कोई संत अपने मन को ही मंदिर मान लेता है, वैसे ही भक्त का मन श्रीकृष्णजी की लीलाओं को हर पल अपने भीतर अनुभव करता है।
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Author - Saroj Jangir
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