आली म्हांने लागे वृन्दावन नीको

आली म्हांने लागे वृन्दावन नीको मीरा बाई पदावली

आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको
आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको।।टेक।।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा दरसण गोविन्दजी को॥
निरमल नीर बहत जमुना में, भोजन दूध दही को।
रतन सिंघासन आप बिराजैं, मुगट धर्‌यो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरति राधिका, सबद सुनन मुरली को।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको॥

(म्हांने,म्हाँणे=मुझको, नीको,नीकाँ=सुन्दर, ठाकुर=कृष्ण, जमणाँ मां=यमुना में, दरसण=दर्शन, मुगट,मुगुट=मुकुट,
ताज, धर्यां=धारण करके, फीको,फीकां=नीरस,व्यर्थ)
 

मस्ती जी चढ़ गई ए बाबाजी दे नाम दी रामदास जोगी पीर धाम

 
वृंदावन की सुंदरता मन को मोह लेती है, जहां हर घर में तुलसी और ठाकुर की पूजा होती है, और गोविंद के दर्शन से हृदय तृप्त हो जाता है। यमुना का निर्मल जल, दूध-दही का भोजन, और रत्न सिंहासन पर विराजे प्रभु का मुकुट सजा रूप—सब कुछ आत्मा को रिझाता है। राधिका की कुंज-कुंज भटकन और मुरली की मधुर धुन मन को प्रभु के प्रेम में डुबो देती है।

मीरा का मन गिरधरनागर में रमा है, जो जानता है कि बिना भजन के जीवन नीरस है। जैसे कोई फूल बिना सुगंध के अधूरा हो, वैसे ही बिना प्रभु भक्ति के नर का जीवन फीका है। यह भक्ति का वह रंग है, जो आत्मा को वृंदावन की उस शाश्वत छवि में लीन कर जीवन को सार्थक बनाता है। 


कैसी जादू डारी । अब तूने कैशी जादु ॥ध्रु०॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे । कुंडलकी छबि न्यारी ॥१॥
वृंदाबन कुंजगलीनमों । लुटी गवालन सारी ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । चरणकमल बलहारी ॥३॥
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