राधे बन्सी हमारी हमें दे दो

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो तुम्हारे किस काम की |
काहे से गाऊँ राधे काहे से बजाऊँ
काहे से लाऊं गइयाँ घेर, तुम्हारे किस काम की ||

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो तुम्हारे किस काम की |
काहे से गाऊँ राधे काहे से बजाऊँ

मुख से गाओ कान्हा हाथों से बजाओ
लाठी से लाओ गइयाँ घेर, हमारे है काम की ||

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो तुम्हारे किस काम की |
काहे से गाऊँ राधे काहे से बजाऊँ

वृन्दावन जाऊँ राधे रास रचाऊँ
काहे से सखियाँ बुलाऊँ, तुम्हारे किस काम की ||

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो तुम्हारे किस काम की |
काहे से गाऊँ राधे काहे से बजाऊँ

वृन्दावन जाओ कान्हा रास रचाओ
नैनों से सखियाँ बुलाओ, हमारे है काम की ||
राधे बन्सी हमारी हमें दे दो तुम्हारे किस काम की |
काहे से गाऊँ राधे काहे से बजाऊँ

Radhe rani de daro bansi mori (Krishna's Request)-Lord Krishna is requesting to Radha Rani please retunn my flute

सुंदर भजन में श्रीकृष्णजी और राधारानी के बीच का प्रेममय संवाद वृंदावन की मधुर लीलाओं को जीवंत करता है। यह वह चंचल ठिठोली है, जो श्रीकृष्णजी की बंसी को लेकर उनके और राधारानी के बीच की प्रेम भरी नोंकझोंक को दर्शाती है। श्रीकृष्णजी की बंसी की चाह, जो गायों को चराने और रास रचाने का आधार है, उनके मन की वह पुकार है, जो बंसी को अपनी हर लीला का साथी मानती है।

राधारानी का जवाब उनकी चंचलता और सादगी को उजागर करता है, जैसे कोई प्रिय सखी अपने सखा को छेड़ती है। वे श्रीकृष्णजी को उनकी बंसी के बिना भी गायों को चराने और सखियों को बुलाने की राह दिखाती हैं, यह कहते हुए कि उनके लिए बंसी उतनी जरूरी नहीं।

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