सुमतिनाथ चालीसा नियमित करे पाठ

सुमतिनाथ चालीसा नियमित करे पाठ

भगवान सुमतिनाथ जैन धर्म के पाँचवें तीर्थंकर हैं, जिन्होंने अहिंसा, सत्य, और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। भगवान सुमतिनाथ ने अपने उपदेशों के माध्यम से समाज में अहिंसा, सत्य, और धर्म के मूल्यों को स्थापित किया। उनकी शिक्षाएँ आत्म-कल्याण और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करती हैं। भगवान सुमतिनाथ जैन धर्म के पाँचवें तीर्थंकर हैं, जिनकी चालीसा का पाठ भक्तों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस चालीसा के प्रत्येक शब्द में अद्भुत शक्ति निहित है, जो समस्त दुःखों और शोकों का निवारण करने में सक्षम है। सच्चे मन से इसका नियमित पाठ करने से जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का आगमन होता है।
 
सुमतिनाथ चालीसा

सुमतिनाथ चालीसा
श्री सुमतिनाथ का करूणा निर्झर, भव्य जनो तक पहूँचे झर – झर ।।
नयनो में प्रभु की छवी भऱ कर, नित चालीसा पढे सब घर – घर ।।
जय श्री सुमतिनाथ भगवान, सब को दो सदबुद्धि – दान ।।
अयोध्या नगरी कल्याणी, मेघरथ राजा मंगला रानी ।।
दोनो के अति पुण्य पर्रजारे, जो तीर्थंकर सुत अवतारे ।।
शुक्ला चैत्र एकादशी आई, प्रभु जन्म की बेला आई ।।
तीन लोक में आनंद छाया, नरकियों ने दुःख भुलाया ।।
मेरू पर प्रभु को ले जा कर, देव न्हवन करते हर्षाकार ।।
तप्त स्वर्ण सम सोहे प्रभु तन, प्रगटा अंग – प्रतयंग में योवन ।।
ब्याही सुन्दर वधुएँ योग, नाना सुखों का करते भोग ।।
राज्य किया प्रभु ने सुव्यवस्थित, नही रहा कोई शत्रु उपस्थित ।।
हुआ एक दिन वैराग्य जब, नीरस लगने लगे भोग सब ।।
जिनवर करते आत्म चिन्तन, लौकान्तिक करते अनुमोदन ।।
गए सहेतुक नावक वन में, दीक्षा ली मध्याह्म समय में ।।
बैसाख शुक्ला नवमी का शुभ दिन, प्रभु ने किया उपवास तीन दिन ।।
हुआ सौमनस नगर विहार, धुम्नधुति ने दिया आहार ।।
बीस वर्ष तक किया तप घोर, आलोकित हुए लोका लोक ।।
एकादशी चैत्र की शुक्ला, धन्य हुई केवल – रवि निकाला ।।
समोशरण में प्रभु विराजे, दृवादश कोठे सुन्दर साजें ।।
दिव्यध्वनि जब खिरी धरा पर, अनहद नाद हुआ नभ उपर ।।
किया व्याख्यान सप्त तत्वो का, दिया द्रष्टान्त देह – नौका का ।।
जीव – अजिव – आश्रव बन्ध, संवर से निर्जरा निर्बन्ध ।।
बन्ध रहित होते है सिद्ध, है यह बात जगत प्रसिद्ध ।।
नौका सम जानो निज देह, नाविक जिसमें आत्म विदह ।।
नौका तिरती ज्यो उदधि में, चेतन फिरता भवोदधि में ।।
हो जाता यदि छिद्र नाव में, पानी आ जाता प्रवाह में ।।
ऐसे ही आश्रव पुद्गल में, तीन योग से हो प्रतीपल में ।।
भरती है नौका ज्यो जल से, बँधती आत्मा पुण्य पाप से ।।
छिद्र बन्द करना है संवर, छोड़ शुभाशुभ – शुद्धभाव धर ।।
जैसे जल को बाहर निकाले, संयम से निर्जरा को पाले ।।
नौका सुखे ज्यों गर्मी से, जीव मुक्त हो ध्यानाग्नि से ।।
ऐसा जान कर करो प्रयास, शाश्वत सुख पाओ सायास ।।
जहाँ जीवों का पुन्य प्रबल था, होता वही विहार स्वयं था ।।
उम्र रही जब एक ही मास, गिरि सम्मेद पे किया निवास ।।
शुक्ल ध्यान से किया कर्मक्षय, सन्धया समय पाया पद अक्षय ।।
चैत्र सुदी एकादशी सुन्दर, पहुँच गए प्रभु मुक्ति मन्दिर ।।
चिन्ह प्रभु का चकवा जान, अविचल कूट पूजे शुभथान ।।
इस असार संसार में , सार नही है शेष ।।
हम सब चालीसा पढे, रहे विषाद न लेश ।।
जैन धर्म में, सुमतिनाथ वर्तमान अवसर्पिणी काल के पांचवें तीर्थंकर थे। उनका जन्म इक्ष्वाकु वंश के राजा मेघप्रभा और रानी सुमंगला के घर अयोध्या में हुआ था। उनका जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था। सुमतिनाथ ने एक आदर्श राजा के रूप में शासन किया। उन्होंने अपने राज्य में न्याय और धर्म की स्थापना की। उन्होंने अपने जीवन में अनेक पुण्यकर्म किए।

उन्होंने वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी को दीक्षा ली और 20 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त किया। सुमतिनाथ को "सुमति" नाम इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने हमेशा सद्विचारों को अपनाया। वे एक महान ज्ञानी और दार्शनिक थे। उन्होंने अपने उपदेशों में जीवों को अहिंसा, करुणा और सत्य का पालन करने का उपदेश दिया।
 
सुमतिनाथ भगवान की करुणा का प्रवाह असीमित है—उनका प्रेम और आशीर्वाद हर जीव तक पहुँचना ही चाहिए। जब उनकी दिव्य छवि नयनों में बस जाती है, तब आत्मा उस शांति का अनुभव करती है, जो केवल सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने से मिल सकती है। उनका नाम और उनकी स्तुति जीवन के प्रत्येक क्षण को सार्थक बना देती है।

अयोध्या की पवित्र भूमि पर जन्मे, मेघरथ राजा और मंगला रानी के पुण्य प्रताप से तीर्थंकर का अवतार हुआ। जब चैत्र शुक्ल एकादशी का शुभ दिन आया, तो तीनों लोकों में आनंद छा गया—संसार का हर प्राणी उनके आगमन से अभिभूत हो गया, और यहां तक कि नरक में पड़े प्राणियों ने भी अपने दुख को भुला दिया।

प्रभु की कृपा और दिव्यता का अनुभव तब और अधिक प्रखर हो गया, जब देवों ने उन्हें मेरु पर्वत पर स्नान कराकर हर्षोल्लास में भाग लिया। उनका स्वरूप तप्त स्वर्ण के समान प्रकाशित हुआ, और उनके अंग-प्रत्यंग में दिव्य तेज व्याप्त हो गया। सुख, वैभव और भोग को सहजता से निभाने के बाद, जब वैराग्य जागा, तब यह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ बन गया—जहाँ सांसारिक नीरसता स्पष्ट रूप से प्रकट हो गई।

इस वैराग्य की परिणति आत्मचिंतन में हुई, जहाँ परम सत्य का बोध जागृत हुआ। जब यह अनुभूति परिपक्व हो जाती है, तब संसार की सभी वस्तुएँ अर्थहीन प्रतीत होती हैं। उसी भाव से प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की, और आत्मा को पूर्ण रूप से तप में समर्पित कर दिया। यह साधना केवल बाहरी नहीं थी—यह जीवन के प्रत्येक विकार को मिटाने की प्रक्रिया थी।

चैत्र शुक्ला एकादशी की धन्यता तब सिद्ध हुई, जब केवलज्ञान प्रकट हुआ। समोशरण में विराजमान होकर, प्रभु ने सप्त तत्वों का विस्तृत व्याख्यान किया, जहाँ देह और आत्मा की तुलना नौका से की गई। जीवन, पदार्थ, कर्म और मुक्ति की इस व्याख्या से यह स्पष्ट हुआ कि जब आत्मा अपने विकारों को दूर करती है, तब वह शुद्धता को प्राप्त करती है।

यह मुक्ति की यात्रा है—संयम, साधना, और ज्ञान से ही यह संभव हो सकती है। जब यह ज्ञान प्रकट हो जाता है, तब जीवन की समस्त बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं। गिरि सम्मेद पर निवास के बाद, जब अंतिम समय आया, तब प्रभु ने अपनी आत्मा को शुद्धतम ध्यान में स्थापित कर परम पद प्राप्त किया। यही मोक्ष का मार्ग है, यही जीवन की वास्तविक सार्थकता है।

इस असार संसार में, परम सत्य की खोज ही वास्तविक यात्रा है। जीवन की हर परीक्षा केवल आत्मा को शुद्ध करने के लिए ही है, और जब यह ज्ञान जागृत हो जाता है, तब आत्मा परम शांति को प्राप्त करती है। यही वह संदेश है, जो प्रत्येक प्राणी को अपनाना चाहिए—संयम, साधना और धर्म की शरण में जाने से ही वास्तविक मुक्ति संभव है।

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