श्रीमद भागवद गीता नित्य स्तुति श्लोक जानिये अर्थ सहित
Saroj Jangir
श्रीमद भागवद गीता नित्य स्तुति श्लोक
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत I
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम II
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम I
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे II
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:I
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन II
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः:I
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: II
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युगों-युगों में प्रकट होता हूँ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। जो व्यक्ति इन्हें सत्यता से जानता है, वह शरीर छोड़ने के बाद पुनर्जन्म नहीं पाता और मेरे पास आता है।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥ जो लोग राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर मेरी शरण में आते हैं, वे अनेक लोग ज्ञान और तप से शुद्ध होकर मेरी अवस्था को प्राप्त करते हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वश:॥ हे पार्थ! जैसे लोग मेरी शरण में आते हैं, वैसे ही मैं उन्हें स्वीकार करता हूँ। सभी मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं।
काङ्क्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥ जो लोग कर्मों के फल की इच्छा रखते हुए देवताओं की पूजा करते हैं, वे जल्दी ही मनुष्यों के संसार में कर्मों के द्वारा सिद्धि प्राप्त करते हैं।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ मैंने गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णों की रचना की है। उनके कर्ता को भी मुझे अव्यय कर्ता के रूप में जानना चाहिए।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥ मेरे कर्मों से मुझे कोई बंधन नहीं होता और न ही मुझे उनके फलों की इच्छा होती है। जो व्यक्ति मुझे इस प्रकार जानता है, वह कर्मों से बंधित नहीं होता।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्॥ इस प्रकार, पूर्वजों द्वारा किए गए कर्मों को जानकर, तुम भी उन्हीं कर्मों को करो, जो वे पहले करते आए हैं।
स्त्रोत और मंत्र में क्या अंतर होता है : स्त्रोत और मंत्र देवताओं को प्रशन्न करते के शक्तिशाली माध्यम हैं। आज हम जानेंगे की मन्त्र और स्त्रोत में क्या अंतर होता है। किसी भी देवता की पूजा करने से पहले उससे सबंधित मन्त्रों को गुरु की सहायता से सिद्ध किया जाना चाहिए।
स्त्रोत : किसी भी देवी या देवता का गुणगान और महिमा का वर्णन किया जाता है। स्त्रोत का जाप करने से अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है और दिव्य शब्दों के चयन से हम उस देवता को प्राप्त कर लेते हैं और इसे किसी भी राग में गाया जा सकता है। स्त्रोत के शब्दों का चयन ही महत्वपूर्ण होता है और ये गीतात्मक होता है।
मन्त्र : मन्त्र को केवल शब्दों का समूह समझना उनके प्रभाव को कम करके आंकना है। मन्त्र तो शक्तिशाली लयबद्ध शब्दों की तरंगे हैं जो बहुत ही चमत्कारिक रूप से कार्य करती हैं। ये तरंगे भटकते हुए मन को केंद्र बिंदु में रखती हैं। शब्दों का संयोजन भी साधारण नहीं होता है, इन्हे ऋषि मुनियों के द्वारा वर्षों की साधना के बाद लिखा गया है।