चरन कमल बंदौ हरि राई सूर दास हिंदी मीनिंग
चरन कमल बंदौ हरि राई सूर दास के पद
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ॥१॥
इस पद में सूरदास जी कहते हैं कि जिन पर श्रीकृष्ण की कृपा हो जाती है, उनके लिए असंभव भी संभव हो जाता है। पंगु पर्वत को लांघ सकता है, अंधा सब कुछ देख सकता है, बहरा सुन सकता है और गूंगा बोल सकता है। यहां तक कि कंगाल भी राजा बन सकता है। सूरदास जी कहते हैं कि ऐसे करूणामय प्रभु की पद-वन्दना कौन अभागा नहीं करेगा?
इस पद में सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की कृपा के कुछ चमत्कारों का वर्णन किया है। इन चमत्कारों से यह पता चलता है कि श्रीकृष्ण की कृपा असीम है। वह किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकते हैं, चाहे वह कितना भी असहाय क्यों न हो। इस पद का संदेश यह है कि हमें हमेशा श्रीकृष्ण की कृपा पाने की कोशिश करनी चाहिए। उनकी कृपा से हम अपने जीवन में सभी कठिनाइयों को पार कर सकते हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।
प्रभु के चरणों में सिर झुकाना ही जीवन का सबसे सुंदर समर्पण है। उनकी कृपा ऐसी है, जो असंभव को संभव बनाती है। लंगड़ा पहाड़ चढ़ जाता है, जैसे मन की कमजोरियां विश्वास की शक्ति से पार हो जाएं। अंधा सब कुछ देख लेता है, मानो आत्मा को सत्य का दर्शन हो।
बहरा सुनने लगता है, जैसे प्रभु की पुकार हृदय तक पहुंचे। गूंगा बोल उठता है, जैसे भक्ति की वाणी मन से फूट पड़े। निर्धन राजा बन जाता है, जैसे प्रभु का प्रेम हर कमी को वैभव में बदल दे। यह उनकी करुणा है, जो हर बंधन तोड़ती है, हर अभाव को पूर्णता देती है।
यह प्रभु की दया का सागर है, जिसमें बार-बार डूबने का मन करता है। उनके चरणों की वंदना करना केवल पूजा नहीं, बल्कि उस प्रेम को जीना है, जो जीवन को उज्ज्वल करता है। जैसे सूर्य की किरणें अंधेरे को चीरती हैं, वैसे ही उनकी कृपा आत्मा को मुक्त करती है, और हर सांस को उनकी महिमा का गीत बना देती है।
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