शून्य गढ शहर शहर घर बस्ती भजन
शून्य गढ शहर शहर घर बस्ती,
कोण सूता कोण जागे है
लाल हमारे हम लालन के,
तन सोता ब्रह्म जागे है ||
जल बिच कमल, कमल बिच कलिया,
भंवर बास ना लेता है
इस नगरी के दस दरवाजे,
जोगी फेरी नीत देता है ||
तन की कुंडी मन का सोटा,
ग्यान की रगड लगाता है
पांच पचीस बसे घट भीतर,
उनकू घोट पिलाता है ||
अगन कुंडसे तपसी तापे,
तपसी तपसा करता है
पांचो चेला फिरे अकेला,
अलख अलख कर जपता है ||
एक अप्सरा सामें ऊभी जी,
दूजी सुरमा हो सारे है ||
तिसरी रंभा सेज बिछाये,
परण्या नहीं कुंवारा है ||
परण्या पहिले पुतर जाया,
मात पिता मन भाया है ||
शरण मछिंदर गोरख बोले,
एक अखंडी ध्याया है ||
Shunya Gadh Shahar by Kumar Gandharva (Lyrics & Meaning)
कोण सूता कोण जागे है
लाल हमारे हम लालन के,
तन सोता ब्रह्म जागे है ||
जल बिच कमल, कमल बिच कलिया,
भंवर बास ना लेता है
इस नगरी के दस दरवाजे,
जोगी फेरी नीत देता है ||
तन की कुंडी मन का सोटा,
ग्यान की रगड लगाता है
पांच पचीस बसे घट भीतर,
उनकू घोट पिलाता है ||
अगन कुंडसे तपसी तापे,
तपसी तपसा करता है
पांचो चेला फिरे अकेला,
अलख अलख कर जपता है ||
एक अप्सरा सामें ऊभी जी,
दूजी सुरमा हो सारे है ||
तिसरी रंभा सेज बिछाये,
परण्या नहीं कुंवारा है ||
परण्या पहिले पुतर जाया,
मात पिता मन भाया है ||
शरण मछिंदर गोरख बोले,
एक अखंडी ध्याया है ||
Shunya Gadh Shahar by Kumar Gandharva (Lyrics & Meaning)
Shoony Gadh Shahar Shahar Ghar Bastee,
Kon Soota Kon Jaage Hai
Laal Hamaare Ham Laalan Ke,
Tan Sota Brahm Jaage Hai ||
Jal Bich Kamal, Kamal Bich Kaliya,
Bhanvar Baas Na Leta Hai
Is Nagaree Ke Das Daravaaje,
Jogee Pheree Neet Deta Hai ||
Tan Kee Kundee Man Ka Sota,
Gyaan Kee Ragad Lagaata Hai
Paanch Pachees Base Ghat Bheetar,
Unakoo Ghot Pilaata Hai ||
Agan Kundase Tapasee Taape,
Tapasee Tapasa Karata Hai
Paancho Chela Phire Akela,
Alakh Alakh Kar Japata Hai ||
Ek Apsara Saamen Oobhee Jee,
Doojee Surama Ho Saare Hai ||
Tisaree Rambha Sej Bichhaaye,
Paranya Nahin Kunvaara Hai ||
Paranya Pahile Putar Jaaya,
Maat Pita Man Bhaaya Hai ||
Sharan Machhindar Gorakh Bole,
Ek Akhandee Dhyaaya Hai ||
Kon Soota Kon Jaage Hai
Laal Hamaare Ham Laalan Ke,
Tan Sota Brahm Jaage Hai ||
Jal Bich Kamal, Kamal Bich Kaliya,
Bhanvar Baas Na Leta Hai
Is Nagaree Ke Das Daravaaje,
Jogee Pheree Neet Deta Hai ||
Tan Kee Kundee Man Ka Sota,
Gyaan Kee Ragad Lagaata Hai
Paanch Pachees Base Ghat Bheetar,
Unakoo Ghot Pilaata Hai ||
Agan Kundase Tapasee Taape,
Tapasee Tapasa Karata Hai
Paancho Chela Phire Akela,
Alakh Alakh Kar Japata Hai ||
Ek Apsara Saamen Oobhee Jee,
Doojee Surama Ho Saare Hai ||
Tisaree Rambha Sej Bichhaaye,
Paranya Nahin Kunvaara Hai ||
Paranya Pahile Putar Jaaya,
Maat Pita Man Bhaaya Hai ||
Sharan Machhindar Gorakh Bole,
Ek Akhandee Dhyaaya Hai ||
शून्य गढ शहर शहर घर बस्ती कौन सूता कौन जागे है
In the empty fort, a city, In the city, a settlement; Who sleeps? Who wakes?
लाल हमरे हम लालान के तन सोता ब्रह्म जागे है
My Love/red is mine, I am my Love/red's; The body sleeps, the Spirit wakes.
जल बिच कमल कमल बिच कलिया भँवर बास न लेता है
Lotus in water, Buds among lotuses; A bee does not dwell.
इस नगरी के दस दरवाजे जोगी फेरी नित देता है
This city has ten gates; The yogi constantly makes the rounds.
तन की कुण्डी मन का सोटा ज्ञानकी रगड लगाता है
Body as mortar, mind as pestle; He grinds wisdom.
पाञ्च पचीस बसे घट भीतर उनकू घोट पिलाता है
Five & 25 dwell in the body; He gives them the drink.
अगन कुण्डसे तपसी तापे तपसी तपसा करता है
In the pit of fire, the tapasi burns; He does his tapas
पाञ्चो चेला फिरे अकेला अलख अलख कर जपता है
Five disciples roam alone; "Unseen, Unseen" it is chanted
एक अप्सरा सामें उभी जी, दूजी सूरमा हो सारे है
An apsara descends in front; A second appears with drowsy eyes
तीसरी रम्भा सेज बिछावे परण्या नहीं कुँवारी है
A third, Rambha, spreads the bed; Unmarried she is a virgin
परण्या पहिले पुतुर जाया मात पिता मन भाया है
Before marriage a son is born; Mother and father rejoice.
शरण मच्छिन्दर गोरख बोले एक अखण्डी ध्याया है
"Macchinder is Refuge!" says Gorakh "Meditate on the Indivisible One!"
In the empty fort, a city, In the city, a settlement; Who sleeps? Who wakes?
लाल हमरे हम लालान के तन सोता ब्रह्म जागे है
My Love/red is mine, I am my Love/red's; The body sleeps, the Spirit wakes.
जल बिच कमल कमल बिच कलिया भँवर बास न लेता है
Lotus in water, Buds among lotuses; A bee does not dwell.
इस नगरी के दस दरवाजे जोगी फेरी नित देता है
This city has ten gates; The yogi constantly makes the rounds.
तन की कुण्डी मन का सोटा ज्ञानकी रगड लगाता है
Body as mortar, mind as pestle; He grinds wisdom.
पाञ्च पचीस बसे घट भीतर उनकू घोट पिलाता है
Five & 25 dwell in the body; He gives them the drink.
अगन कुण्डसे तपसी तापे तपसी तपसा करता है
In the pit of fire, the tapasi burns; He does his tapas
पाञ्चो चेला फिरे अकेला अलख अलख कर जपता है
Five disciples roam alone; "Unseen, Unseen" it is chanted
एक अप्सरा सामें उभी जी, दूजी सूरमा हो सारे है
An apsara descends in front; A second appears with drowsy eyes
तीसरी रम्भा सेज बिछावे परण्या नहीं कुँवारी है
A third, Rambha, spreads the bed; Unmarried she is a virgin
परण्या पहिले पुतुर जाया मात पिता मन भाया है
Before marriage a son is born; Mother and father rejoice.
शरण मच्छिन्दर गोरख बोले एक अखण्डी ध्याया है
"Macchinder is Refuge!" says Gorakh "Meditate on the Indivisible One!"
इस गीत में कई गहरे अर्थ छिपे हुए हैं, और इसका सीधा अर्थ हिन्दी में भी स्पष्ट नहीं होता। इसलिए इसका अनुवाद करना उतना उचित नहीं है, और न ही इसका दृश्य रूप देना आसान है। यहाँ गोरखनाथ एक ऐसे दृश्य का वर्णन कर रहे हैं, जब वे भोर होने से पहले किसी नगर में प्रवेश करते हैं और वहाँ की खालीपन को देखते हैं। यह खालीपन केवल उस नगर का नहीं, बल्कि पूरे भौतिक जीवन (माया) का प्रतीक भी हो सकता है। यह एक जागृति का संदेश है—गुरु की शरण में जाने और ‘कैवल्य’ या ‘अलख निरंजन’ (निर्गुण, निराकार परम तत्व) का ध्यान करने का।
अब वे आगे समझाते हैं—
जब पूरी दुनिया (माया में) सोई हुई है, तब भी आत्मा, ब्रह्म, गुरु और सच्चा प्रेम हमेशा जागृत रहते हैं।
सरोवर में सुंदर कमल और उससे भी सुंदर कलियाँ हैं, फिर भी भँवरा (मधुकर) वहाँ ठहरता नहीं। कुमार गंधर्व इसे दो तरीकों से गाते हैं, जिनमें से एक अर्थ यह भी है कि भँवरा केवल सुगंध लेकर आगे बढ़ जाता है। उसी प्रकार, चाहे कितने भी आकर्षण हों, योगी उनमें आसक्त नहीं होता। ‘मधुकर’ यानी भँवरा और एक संन्यासी दोनों ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं, पर कहीं टिकते नहीं। शरीर रूपी किले के दस द्वार (इंद्रियाँ) हैं—जो आकर्षण के मार्ग हैं—और योगी को सदैव उनकी रक्षा करनी चाहिए।
योगी शरीर और मन को ओखली-मूसल बनाकर निरंतर ज्ञान का मंथन करता है। जब उसे सच्चे ज्ञान का अमृत मिल जाता है, तो वह पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और 25 तत्त्वों (मन आदि) को भी उसका अनुभव कराता है, ताकि वे अपनी असली पहचान—दिव्यता—को पहचान सकें।
तपस्वी ‘पंचाग्नि साधना’ करता है—अर्थात पाँच अग्नियों के बीच तप करता है। पाँच शिष्य (पाँच तत्व) गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करते हैं। “अलख, अलख” का जप चलता रहता है—यही जप स्वयं ध्यान का माध्यम है।
जैसे-जैसे योगी की साधना बढ़ती है, वैसे-वैसे माया के प्रलोभन भी बढ़ते हैं। पहले एक अप्सरा भेजी जाती है, फिर दूसरी, और अंत में सबसे सुंदर रंभा को भी भेजा जाता है, ताकि योगी विचलित हो जाए।
कथा के अनुसार, उसके विवाह से पहले ही एक पुत्र का जन्म हो जाता है—और इस प्रकार योगी की तपस्या भंग हो जाती है। यह माया की जीत होती है, जहाँ माता-पिता बच्चे के जन्म पर प्रसन्न होते हैं। लेकिन गोरखनाथ सजग रहते हैं—वे अपने गुरु को स्मरण करते हैं और स्वयं को भी यह याद दिलाते हैं कि उन्हें केवल परम सत्य का ही ध्यान करना है।
अब वे आगे समझाते हैं—
जब पूरी दुनिया (माया में) सोई हुई है, तब भी आत्मा, ब्रह्म, गुरु और सच्चा प्रेम हमेशा जागृत रहते हैं।
सरोवर में सुंदर कमल और उससे भी सुंदर कलियाँ हैं, फिर भी भँवरा (मधुकर) वहाँ ठहरता नहीं। कुमार गंधर्व इसे दो तरीकों से गाते हैं, जिनमें से एक अर्थ यह भी है कि भँवरा केवल सुगंध लेकर आगे बढ़ जाता है। उसी प्रकार, चाहे कितने भी आकर्षण हों, योगी उनमें आसक्त नहीं होता। ‘मधुकर’ यानी भँवरा और एक संन्यासी दोनों ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं, पर कहीं टिकते नहीं। शरीर रूपी किले के दस द्वार (इंद्रियाँ) हैं—जो आकर्षण के मार्ग हैं—और योगी को सदैव उनकी रक्षा करनी चाहिए।
योगी शरीर और मन को ओखली-मूसल बनाकर निरंतर ज्ञान का मंथन करता है। जब उसे सच्चे ज्ञान का अमृत मिल जाता है, तो वह पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और 25 तत्त्वों (मन आदि) को भी उसका अनुभव कराता है, ताकि वे अपनी असली पहचान—दिव्यता—को पहचान सकें।
तपस्वी ‘पंचाग्नि साधना’ करता है—अर्थात पाँच अग्नियों के बीच तप करता है। पाँच शिष्य (पाँच तत्व) गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करते हैं। “अलख, अलख” का जप चलता रहता है—यही जप स्वयं ध्यान का माध्यम है।
जैसे-जैसे योगी की साधना बढ़ती है, वैसे-वैसे माया के प्रलोभन भी बढ़ते हैं। पहले एक अप्सरा भेजी जाती है, फिर दूसरी, और अंत में सबसे सुंदर रंभा को भी भेजा जाता है, ताकि योगी विचलित हो जाए।
कथा के अनुसार, उसके विवाह से पहले ही एक पुत्र का जन्म हो जाता है—और इस प्रकार योगी की तपस्या भंग हो जाती है। यह माया की जीत होती है, जहाँ माता-पिता बच्चे के जन्म पर प्रसन्न होते हैं। लेकिन गोरखनाथ सजग रहते हैं—वे अपने गुरु को स्मरण करते हैं और स्वयं को भी यह याद दिलाते हैं कि उन्हें केवल परम सत्य का ही ध्यान करना है।
आपको ये पोस्ट पसंद आ सकती हैं
