पीड़ तेरे जान दी मीनिंग गुरुदास मान सोंग
पीर : पीड़ा, दुःख
किद्दा : कैसे
जरांगा (दुःख को सहन करना )
-तेरे जाने की पीड को मैं कैसे सहन करूँगा ? तेरे बगैर जिन्दगी नु की करांगा में
-तेरे बगैर जिंदगी का कोई मतलब नहीं है, में इसका क्या करूँगा ?
पीर तेरे जान दी -तेरे जाने का दुःख
पीर तेरे जान दी -तेरे जाने का दुःख की करांगा प्यार दी लुट्टी बहार नू
-प्यार के उजड़ चुके बसंत का में क्या करूँगा ?
सज्जियाँ सजाइयाँ मफ़िला घुन्डे सिंगार नूं -सजी हुयी महफिले और सजे हुए आपसी मिलन का हत्थी मरी मुस्कान दा मातम करांगा में
हत्थी : हाथोंसे
मस्कान : बहुत सुंदर नारी
मातम : दुःख मनाना
-में तो अपने हाथों से उसका मातम मनाऊंगा। सजन के चले जाने पर में तो हाथ पीट कर मातम मनाऊंगा।
तेरे बगैर जिन्दगी नु की करांगा में -तेरे बगैर जिंदगी का कोई मतलब नहीं है, में इसका क्या करूँगा ? पीर तेरे जान दी
-तेरे जाने का दुःख पीर तेरे जान दी
-तेरे जाने का दुःख जे रो पेया तो केहण गे दीवाना हो गया
दीवाना : पाग़ल
-अगर में रोता हूँ तो लोग कहेंगे की मैं पागल हो गया हूँ। ना बोलिया तां के ण गे बेगाना हो गया
-अगर मैंचुप रहता हूँ तो लोग कहेंगे की मुझे किसी से कोई लेना देना नहीं है।
लोकां दी इस जुबान जो किद्दा फड़ां गा में
किद्दा : कैसे
फड़ांगा : पकड़ना
-लोगों की जुबान को मैं कैसे पकडूँगा तेरे बगैर जिन्दगी नु की करांगा में
-तेरे बगैर जिंदगी का कोई मतलब नहीं है, में इसका क्या करूँगा ?
पीर तेरे जान दी
-तेरे जाने का दुःख पीर तेरे जान दी
-तेरे जाने का दुःख साहां दी डुब्बी नाव नूं न झोका मिले या ना
साहां : मेरी (असां दी )
झौका : मदद का हाथ
-मेरी डूबती नांव को कोई मदद मिले या ना मिले इस जहॉंण मिलण दा मौका मिले या ना
-जीवन रहते इस जहां में मिलने का मौका मिले या नहीं। अगले जनम मिलण दी कोशिश करांगा में
-में अगले जनम फिर से मिलने की कोशिश करूँगा।
तेरे बगैर जिन्दगी नु की करांगा में
-तेरे बगैर जिंदगी का कोई मतलब नहीं है, में इसका क्या करूँगा ? पीर तेरे जान दी
-तेरे जाने का दुःख पीर तेरे जान दी
-तेरे जाने का दुःख सजणा ज़रा ठेर जा सजदा तां कर लवां
-जरा रुको, मैं तुम्हे आखिर बार सलाम कर लूँ (सजदा -रेस्पेक्ट से सर झुकाना ) अठरु ना कोई वेख ले परदा तां कर लवा
-मेरे आंशुओं को कोई देख ना ले, में परदा कर लू।
'माना ' दिला दी सेज ते पत्थर धारान्गा मैं
-दिल पर पत्थर रखना होगा ए जाण वालिया अलविदा ए नहीं कहांगा में
-मैं तुम्हे अलविदा भी नहीं कह सकता हूँ।
यह गीत प्रेमी की व्यथा से शुरू होता है – तेरे जाने की पीड़ा (पीर तेरे जान दी) को मैं कैसे सहन करूंगा (किद्दा जरांगा मैं)? तेरे बगैर इस जिंदगी का क्या करूंगा? जीवन बिल्कुल अर्थहीन हो गया है। प्यार की वो बहार जो लुट गई (प्यार दी लुट्टी बहार नू), उस उजड़ चुके बसंत का मैं क्या करूंगा? वो सजी-धजी महफिलें, वो सजे हुए मिलन के पल (सज्जियाँ सजाइयाँ मफ़िला घुन्डे सिंगार नूं), और मेरी मुस्कान जो इतनी खूबसूरत थी – अब तो मैं हाथ पीट-पीट कर उस मुस्कान का मातम (हत्थी मरी मुस्कान दा मातम) मनाऊंगा, जैसे किसी की मौत पर मातम मनाते हैं। तेरे बिना जिंदगी का क्या करूंगा? तेरे जाने का यह दर्द...
अगर मैं रो पड़ूं तो लोग कहेंगे कि मैं पागल (दीवाना) हो गया हूं। और अगर चुप रहूं तो कहेंगे कि मैं बेगाना (उदासीन, किसी से मतलब नहीं रखने वाला) हो गया हूं। लोगों की इस जुबान (लोकां दी इस जुबान) को मैं कैसे पकड़ूंगा या रोकूंगा? उनकी बातों से कैसे बचूंगा? तेरे बिना जिंदगी का क्या करूंगा? तेरे जाने का दर्द...
मेरी सांसों की डूबती नाव (साहां दी डुब्बी नाव) को चाहे कोई झोंका (झोका – मदद का हाथ) मिले या न मिले, इस जहां में मिलने का मौका मिले या न मिले – मैं अगले जन्म में फिर से तुझसे मिलने की कोशिश करूंगा। तेरे बिना जिंदगी का क्या करूंगा? तेरे जाने का दर्द...
गुरदास मान पंजाबी संगीत के एक जीवंत किंवदंती और सबसे प्रभावशाली कलाकार हैं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज, हृदयस्पर्शी गीत लेखन और गहन भावनाओं से न केवल पंजाब बल्कि पूरी दुनिया में पंजाबी संस्कृति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। 4 जनवरी 1957 को पंजाब के गिद्दड़बाहा में जन्मे गुरदास मान ने 1980 में अपने हिट गीत "दिल दा मामला है" से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की और तब से उन्होंने 34 से अधिक एल्बम जारी किए हैं, जिसमें 305 से ज्यादा गाने लिखे और गाए हैं। वे एक स्व-शिक्षित मास्टर हैं, जिन्होंने लोक संगीत, भांगड़ा, रोमांटिक गीतों और सामाजिक मुद्दों पर आधारित रचनाओं से पंजाबी संगीत को वैश्विक मंच प्रदान किया। फिल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया, जैसे "वारिस शाह: इश्क दा वारिस" में उनकी गायकी के लिए उन्हें 2006 में सर्वश्रेष्ठ पुरुष प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला – यह उपलब्धि किसी पंजाबी गायक के लिए अनोखी है। इसके अलावा, "देस होया परदेस" के लिए उन्हें जूरी अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ। आज भी 69 वर्ष की उम्र में वे सक्रिय हैं, हाल ही में 2026 में मुंबई और टोरंटो जैसे शहरों में भव्य कॉन्सर्ट दे रहे हैं, जो साबित करता है कि उनकी लोकप्रियता और संगीत की जादुई ताकत कभी कम नहीं होती। गुरदास मान न सिर्फ एक गायक हैं, बल्कि पंजाब की शान, भावनाओं के दर्पण और संस्कृति के संरक्षक हैं, जिनके गीत पीढ़ियों को जोड़ते रहेंगे।
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