गुरूजी ने दिया अमर नाम भजन

गुरूजी ने दिया अमर नाम भजन

 
गुरूजी ने दिया अमर नाम Guruji Ne Diya Amar Nam Lyrics

नाम सरीखो यो दान
मती दो अजान ने
घुघु देखे तारा हंदी ज्योत
कई जाने भाण ने
गुरूजी ने दिया अमर नाम
गुरु तो सरीखा कोई नहीं
अलख भरया है भण्डार
कमी जा में है नहीं
नाम सरीखो यो दान
मती दो अजान ने
घुघु देखे तारा हंदी ज्योत
कई जाने भाण ने
गुरूजी ने दियो
खर्चे से ना खूटिया
जलाया से ना जले
वांचो वेद पुराण
नाम गुरु बिना ना मिले
गुरूजी ने दियो
उग्या जल थल भाण
चंदा तारा तो छिप गया
जप तप योग अनेक
नाम तले दबी गया
गुरूजी ने दियो
चित मन चिंता मिट्यो
रटो निज नाम ने
घट भीतर साहिब कबीर
चलो निज धाम ने
गुरूजी ने दियो 

Guruji ne diya amar naam
Guru to sareekha koi nahin
Alakh bharya hai bhandaar
Kami ja mein hai nahin
Naam sareekho yo daan
Mati do ajaan ne
Ghughu dekhe taara handi jyot
Kai jaane bhaan ne
Guruji ne diyo
Kharche se na khootiya
Jalaaya se na jale
Vaancho ved puraan
Naam guru bina na mile
Guruji ne diyo
Ugya jal thal bhaan
Chanda taara to chhip gaya
Jap tap yog anek
Naam tale dabi gaya
Guruji ne diyo
Chit mann chinta mityo
Rato nij naam ne
Ghat bheetar saahib Kabir
Chalo nij dhaam ne
Guruji ne diyo

'Guruji Ne Diyo Amar Naam' by Vijay Sardeshmukh

नाम सरीखो यो दान
मती दो अजान ने
घुघु देखे तारा हंदी ज्योत
कई जाने भाण ने?
Don’t give a gift like the Name 
to an ignorant person. 
A foolish owl may see starlight 
but never know the sun. 

Song Credits:
Vocals: Vijay Sardeshmukh
Harmonium: Vyasmurthy Katti
Tabla: Mandar Puranik
Tanpura: Vidya Rao 

Dogged by a persistent sense of lack, if we are graced with the gift of the Name, a world of abundance opens up in our lives. This is akin to the sun bursting forth for an owl accustomed to living by starlight, says Kabir. This song was composed by the legendary classical singer Kumar Gandharva, and is sung here by his disciple Vijay Sardeshmukh, with quiet depth and intensity.

यह सुंदर भजन संत कबीर की विचारधारा से ओत-प्रोत है, जिसमें गुरु की महिमा और उनके द्वारा दिए गए 'नाम' (परमात्मा के सच्चे स्मरण) की महत्ता का वर्णन किया गया है। कवि कहते हैं कि गुरु ने शिष्य को एक ऐसा अमर नाम दे दिया है, जिसके समान इस संसार में कोई दूसरा नहीं है, क्योंकि गुरु के पास आध्यात्मिक ज्ञान का ऐसा अटूट भंडार है जिसमें कभी कोई कमी नहीं आती। इस 'नाम' रूपी दान को किसी अज्ञानी या कद्र न करने वाले को नहीं देना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे उल्लू दिन में सूर्य के प्रकाश और तारों की ज्योति को नहीं देख पाता और उसकी महत्ता नहीं समझता। गुरु द्वारा दिया गया यह नाम अलौकिक है जिसे न तो खर्च करने से कम किया जा सकता है और न ही अग्नि जला सकती है; यहाँ तक कि वेदों और पुराणों को पढ़ने से भी वह शांति नहीं मिलती जो गुरु के सान्निध्य में नाम जपने से मिलती है। 

जैसे सूर्य के उदय होते ही चंद्रमा और तारे फीके पड़ जाते हैं, वैसे ही गुरु-नाम के प्रकट होते ही जप, तप और अन्य सभी योग साधनाएं गौण हो जाती हैं। अंत में कवि समझाते हैं कि इस निज नाम का स्मरण करने से मन की सारी चिंताएं मिट जाती हैं और हृदय के भीतर ही साहिब कबीर (परमात्मा) का साक्षात्कार होता है, जिससे जीव अपने वास्तविक घर यानी मोक्ष की ओर प्रस्थान कर सकता है। 

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