माखन खिलाऊँगी मैं मिश्री खिलाऊँगी मैं

माखन खिलाऊँगी मैं मिश्री खिलाऊँगी मैं भजन

 
माखन खिलाऊँगी मैं मिश्री खिलाऊँगी मैं

माखन खिलाऊँगी मैं, मिश्री खिलाऊँगी मैं,
मान भी जाओ कान्हा, अब ना सताउंगी मैं,
आ जाओ इक बार कान्हा, बंसी बजाओ इक बार,
रे कान्हा, बंसी बजाओ इक बार,

भर भर मटकी माखन की लाऊंगी,
मोर मुकुट तेरे माथे सजाऊँगी,
रास रचाने को संग कान्हा,
सखियाँ सारी नगरिया की लाऊंगी,
ना रूठो मेरे कान्हा, मान भी जाओ कान्हा,
लगो गले इक बार कान्हा, बंसी बजाओ इक बार,
रे कान्हा, बसी बजाओ इक बार,

राधा से तेरा ब्याह कराउंगी,
मथुरा को दुल्हन सा सजाऊँगी,
सारी नगरिया को भोजन कराउंगी,
ढोल नगाड़े नगर बजवाऊंगी,
अब ना सताओ कान्हा, मान भी जाओ कान्हा,
छोड़ के सब तकरार कान्हा, बंसी बजाओ इक बार,
रे कान्हा, बंसी बजाओ इक बार,
 


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Bhajan- Makhan khilaungi main 
Album- Krishna krishna radhay radhay
Singer- Lakshmi Kapil
Composer - Ajay Kapil
Music- Ajay Kapil
Lyrics- Kishan Bamnawat
Company - Niharika Productions
Released on - Sep 5, 2015
 
राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम और वृंदावन की मधुर लीलाओं को जीवंत करती है, जो भक्त के हृदय को प्रभु के चरणों में समर्पित करने की प्रेरणा देती है। कृष्ण के प्रति भक्त का प्रेम इतना गहरा है कि वह माखन-मिश्री, मोर मुकुट और सखियों के साथ रास रचाने की तैयारी करता है, ताकि कान्हा का मन जीत सके। राधा के साथ उनके ब्याह की कल्पना और मथुरा को दुल्हन सा सजाने का संकल्प भक्त की भक्ति की तीव्रता को दर्शाता है। यह भजन सिखाता है कि सच्ची भक्ति में तकरार और रूठने-मनाने का भाव भी प्रेम का एक रूप है, जो भक्त को प्रभु के और करीब लाता है। कान्हा की बंसी की धुन वह अलौकिक रस है, जो भक्त के मन को प्रभु के रंग में रंग देती है। भक्त और भगवान के बीच के प्रेम भरे रिश्ते को दर्शाता है, जहाँ भक्त अपने आराध्य से शिकायत करती है, उन्हें मनाती है और उनसे अपनी सभी तकरारें भूलकर वापस आने और अपनी मधुर बांसुरी बजाने का अनुरोध करती है।
 
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