म्हारें जनम मरण रा साथी थाँने नहिं भजन
म्हारें जनम मरण रा साथी थाँने नहिं बिसरूँ भजन
म्हारें जनम मरण रा साथी, थाणे नहिं बिसरूँ दिन राती,
(साथी, साथी, साथी, साथी)
थाँ देख्याँ बिन कल न पड़त है, जाणत मोरी छाती,
ऊँची चढ़-चढ़ पंथ निहारूँ, रोय-रोय अँखिया राती,
यो संसार सकल जग झूँठो, झूँठा कुल रा न्याती,
दोउ कर जोड्याँ अरज करूँ छू, सुणल्यो म्हारी बाती,
यो मन मेरो बड़ो हरामी, ज्यूँ मदमातो हाथी,
सत्गुरू हाथ धर्यो सिर ऊपर, आँकुस दे समझाती,
पल-पल पिय को रूप निहारूँ, निरख निरख सुख पाती,
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ चित राती,
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Vocals - Mhare Janam Maran Raa Saathi - Devi Chitralekhaji
म्हारे जनम-मरण के साथी, तुझे दिन-रात नहीं भूल सकती। तेरे बिना एक पल भी अच्छा नहीं लगता। आँखें ऊँची चढ़-चढ़कर राह देखती रहती हैं, रो-रोकर लाल हो गई हैं। यह सारा संसार झूठा है, रिश्ते-नाते सब झूठे हैं। बस तेरा साथ सच्चा है।
दोनों हाथ जोड़कर अरज करती हूँ, मेरी बात सुन ले। मेरा मन बड़ा हरामी है, जैसे मदमाता हाथी, बार-बार भटक जाता है। सत्गुरु ने हाथ सिर पर रख दिया, आँकुस देकर समझाया। अब पल-पल तेरा रूप निहारती हूँ, देख-देखकर सुख पाती हूँ।
मीरा कहती है, गिरिधर नागर मेरे प्रभु हैं। उनके चरणों में चित्त लगा दिया है। अब न कोई डर है, न कोई चिंता। बस तेरे नाम में डूबी रहती हूँ। जीवन और मृत्यु दोनों में तू ही साथी है, तुझे कभी नहीं भूलूँगी।
तेरे साथ रहते ही सारी उलझनें दूर हो जाती हैं। दिल को सुकून मिलता है और हर पल तेरी याद में गुजरने लगता है।
आप सभी पर ईश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री कृष्ण जी की।
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