प्यारे दर्शन दीजो आय मीराबाई भजन
प्यारे दर्शन दीजो आय मीराबाई भजन
प्यारे दर्शन दीजो आय, तुम बिन रह्ययो न जाय।
जल बिन कमल, चंद बिन रजनी, ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी॥
आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन, विरह कलेजा खाय॥
दिवस न भूख नींद नहिं रैना, मुख के कथन न आवे बैनां॥
कहा करूं कुछ कहत न आवै, मिल कर तपत बुझाय॥
क्यों तरसाओ अतंरजामी, आय मिलो किरपा कर स्वामी।
मीरा दासी जनम जनम की, परी तुम्हारे पायं॥
जल बिन कमल, चंद बिन रजनी, ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी॥
आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन, विरह कलेजा खाय॥
दिवस न भूख नींद नहिं रैना, मुख के कथन न आवे बैनां॥
कहा करूं कुछ कहत न आवै, मिल कर तपत बुझाय॥
क्यों तरसाओ अतंरजामी, आय मिलो किरपा कर स्वामी।
मीरा दासी जनम जनम की, परी तुम्हारे पायं॥
इस पद के विषय में : इस
पद में मीरा बाई का श्री कृष्ण जी के प्रति अलौकिक प्रेम का प्रदर्शन होता
है। मीरा (जीवात्मा) परमात्मा (श्री कृष्ण ) जी से मिलने को सदा आतुर और
बेचैन है। वह विनय करती है की हे प्रिय यह विरह की अग्नि बहुत ही तीव्र है
जिसके कारण से वह बेचैन है तुम आकर अब तो दर्शन दे दो। प्रभु मिलन की आस
में / विरह में आत्मा से भूख प्यास आदि सब छीन लिए हैं और अब वह रह नहीं पा
रही है। जीवात्मा आकुल और व्याकुल फिरती है, उसे चैन नहीं मिल रहा है।
जैसे जल के बिना कमल अधुरा है, चाँद के बिना रात अधूरी है, ऐसे ही तुम्हारे
बिन सजनी, मीरा अधूरी और व्यथित है। विरह की यह अग्नि हृदय में संताप पैदा
करती है। विरह में ना तो दिन में भूख लगती है और ना ही रात्री में नींद ही
आती है। यह विरह की अग्नि की को वर्णन भी नहीं किया जा रहा है। यह तपन
आपके मिलने से ही बुझ सकती है। अब इस आत्मा को मत तरसाओं और आकर दर्शन
दिखाओ। आप स्वामी हो और आत्मा दास, मीरा तो तुम्हारी जनम जनम की दासी है
जिसे आकर आप दर्शन तो, वह अब तुम्हारे पाँव में पड़ी है।
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प्यारे दर्शन दीजो आय, तुम बिन रह्यो न जाए|| जल बिन कमल चंद बिन रजनी , ऐसे तुम देख्या बिन सजनी|
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