गणेश भुजंग स्तोत्र मीनिंग महत्त्व जानिये
रणत्क्षुद्रघण्टानिनादाभिरामं
चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम्।
लसत्तुन्दिलाङ्गोपरिव्यालहारं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं
स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्बीजपूरम्।
गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसून-
प्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम्।
प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
विचित्रस्फुरद्रत्नमालाकिरीटं
किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम्।
विभूषैकभूशं भवध्वंसहेतुं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूलो-
च्चलद्भ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम्।
मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं
कृपाकोमलोदारलीलावतारम्।
कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यै-
र्गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
यमेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं
गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम्।
परं पारमोङ्कारमाम्नायगर्भं
वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे॥
चिदानन्दसान्द्राय शान्ताय तुभ्यं
नमो विश्वकर्त्रे च हर्त्रे च तुभ्यम्।
नमोऽनन्तलीलाय कैवल्यभासे
नमो विश्वबीज प्रसीदेशसूनो ॥
इमं संस्तवं प्रातरुत्थाय भक्त्या
पठेद्यस्तु मर्त्यो लभेत्सर्वकामान्।
गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचो
गणेशे विभौ दुर्लभं किं प्रसन्ने॥
लसत्तुन्दिलाङ्गोपरिव्यालहारं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं
स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्बीजपूरम्।
गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसून-
प्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम्।
प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
विचित्रस्फुरद्रत्नमालाकिरीटं
किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम्।
विभूषैकभूशं भवध्वंसहेतुं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूलो-
च्चलद्भ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम्।
मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं
गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं
कृपाकोमलोदारलीलावतारम्।
कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यै-
र्गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
यमेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं
गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम्।
परं पारमोङ्कारमाम्नायगर्भं
वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे॥
चिदानन्दसान्द्राय शान्ताय तुभ्यं
नमो विश्वकर्त्रे च हर्त्रे च तुभ्यम्।
नमोऽनन्तलीलाय कैवल्यभासे
नमो विश्वबीज प्रसीदेशसूनो ॥
इमं संस्तवं प्रातरुत्थाय भक्त्या
पठेद्यस्तु मर्त्यो लभेत्सर्वकामान्।
गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचो
गणेशे विभौ दुर्लभं किं प्रसन्ने॥
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अर्थ और महत्त्व
यह गणेश भुजंग प्रार्थना स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है, जो भगवान गणेश के नृत्यरूप और दिव्य गुणों का वर्णन करता है। अनुवाद और प्रमुख शब्दार्थ-
रणत्क्षुद्रघण्टानिनादाभिरामं चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम्।
छोटी घंटियों की मधुर ध्वनि से सुशोभित, तांडव नृत्य में उन्मुक्त कमल जैसे पैरों वाला।
शब्दार्थ: रणत्=गूंजना, क्षुद्र=छोटी, घण्टा=घंटी, अभिरामं=आकर्षक, ताण्डव=शिवनृत्य, उद्दण्ड=उन्मुक्त, पद्मताल=कमल पैर।
लसत्तुन्दिलाङ्गोपरिव्यालहारं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
चमकते पेट पर सर्प की माला पहने गणाधीश, ईशान (शिव) पुत्र को नमस्कार।
शब्दार्थ: लसत्=चमकदार, तुन्दिल=पेट, व्याल=सर्प, हारं=माला, तमीडे=स्तुति।
द्वितीय श्लोक
ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्बीजपूरम्।
वीणा की ध्वनि से प्रसन्न मुख वाला, कंपते कुंडल से चमकते बीजपूर (तemple रस) भरा।
शब्दार्थ: ध्वनिध्वंस=ध्वनि नाशक, वीणालय=वीणा लय, स्फुरत्=कंपित, चुण्ड=कुंडल, बीजपूर=अनार जैसे मंदिर।
गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
टपकते गर्व-सुगंध से चंचल अली (मधु) माला वाला गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: गलत्=टपकना, दर्प=गर्व, सौगंध्य=सुगंध, लोल=चंचल, अली=भौंरा।
प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसूनप्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम्।
प्रकाशित जपाकुसुम जैसे रक्तिम फूलों और प्रवालों से आरुणिमान ज्योति।
शब्दार्थ: जपारक्त=जपाकुसुम रंग, प्रसून=फूल, प्रवाल=मूंगा, अरुण=लालिमान।
प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
लंबे उदर, वक्र सूंड और एकदंत गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: प्रलम्बोदर=लंबा पेट, वक्रतुंड=वक्र सूंड।
विचित्रस्फुरद्रत्नमालाकिरीटं किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम्।
विचित्र रत्नमाला युक्त मुकुट, चंद्ररेखा से विभूषित।
शब्दार्थ: विचित्र=विविध, स्फुरद्रत्न=चमकते रत्न, किरीट=मुकुट।
विभूषैकभूशं भवध्वंसहेतुं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
आभूषणों का एकमात्र आभूषण, संसार-नाश का कारण गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: एकभूशं=एक आभूषण सज्जित, भवध्वंस=जगत् नाश।
उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूलोच्चलद्भ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम्।
उछलती भुजावल्ली मूल दृश्य, चंचल भ्रूलता से प्रकाशित दक्षिण भुजा।
शब्दार्थ: उदञ्चत्=उछलती, भुजावल्ली=भुजा लताएँ, भ्राजदक्ष=प्रकाशमान दक्षिण।
मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
मरुतसुंदरियों के चामर से सेवित गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: मरुत्सुन्दरी=वायुदेवी रूपी सुंदरियाँ।
स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं कृपाकोमलोदारलीलावतारम्।
कंपित कठोर चंचल पिंगाक्षी जिह्ना, कृपा-कोमल लीला अवतार।
शब्दार्थ: निष्ठुर=कठोर, आलोलपिंगाक्षी=चंचल पीली आँख जिह्ना।
कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यैर्गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
कलाबिंदु (तीन नेत्र बिंदु) को योगिवर्य गाते हैं, गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: कलाबिन्दु=कला बिंदु (ललाट बिंदु)।
यमेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम्।
एकाक्षर (ॐ), निर्मल, निर्विकल्प, गुणातीत आनंद, आकारशून्य।
शब्दार्थ: निर्विकल्प=विचार रहित, आकारशून्य=रूपरहित।
परं पारमोङ्कारमाम्नायगर्भं वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे॥
परम ओमकार, वेदगर्भ, पुराण गाते हैं उसे नमस्कार।
शब्दार्थ: अम्नायगर्भ=वेदों का गर्भ।
चिदानन्दसान्द्राय शान्ताय तुभ्यं नमो विश्वकर्त्रे च हर्त्रे च तुभ्यम्।
चिदानंद संनादित शांत को नमो, विश्वकर्ता-हर्ता को नमो।
शब्दार्थ: सान्द्र=घना, विश्वकर्त्रे=सृष्टिकर्ता।
नमोऽनन्तलीलाय कैवल्यभासे नमो विश्वबीज प्रसीदेशसूनो ॥
अनंतलीला, कैवल्यप्रकाश को नमो, विश्वबीज शिवपुत्र को नमो।
शब्दार्थ: कैवल्यभासे=मोक्ष प्रकाश।
इमं संस्तवं प्रातरुत्थाय भक्त्या पठेद्यस्तु मर्त्यो लभेत्सर्वकामान्।
सुबह उठकर भक्ति से पढ़ने वाला सभी कामनाएँ पाए।
गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचो गणेशे विभौ दुर्लभं किं प्रसन्ने॥
गणेश कृपा से वाणी सिद्ध, प्रसन्न गणेश में क्या दुर्लभ।
रणत्क्षुद्रघण्टानिनादाभिरामं चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम्।
छोटी घंटियों की मधुर ध्वनि से सुशोभित, तांडव नृत्य में उन्मुक्त कमल जैसे पैरों वाला।
शब्दार्थ: रणत्=गूंजना, क्षुद्र=छोटी, घण्टा=घंटी, अभिरामं=आकर्षक, ताण्डव=शिवनृत्य, उद्दण्ड=उन्मुक्त, पद्मताल=कमल पैर।
लसत्तुन्दिलाङ्गोपरिव्यालहारं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
चमकते पेट पर सर्प की माला पहने गणाधीश, ईशान (शिव) पुत्र को नमस्कार।
शब्दार्थ: लसत्=चमकदार, तुन्दिल=पेट, व्याल=सर्प, हारं=माला, तमीडे=स्तुति।
द्वितीय श्लोक
ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्बीजपूरम्।
वीणा की ध्वनि से प्रसन्न मुख वाला, कंपते कुंडल से चमकते बीजपूर (तemple रस) भरा।
शब्दार्थ: ध्वनिध्वंस=ध्वनि नाशक, वीणालय=वीणा लय, स्फुरत्=कंपित, चुण्ड=कुंडल, बीजपूर=अनार जैसे मंदिर।
गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
टपकते गर्व-सुगंध से चंचल अली (मधु) माला वाला गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: गलत्=टपकना, दर्प=गर्व, सौगंध्य=सुगंध, लोल=चंचल, अली=भौंरा।
प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसूनप्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम्।
प्रकाशित जपाकुसुम जैसे रक्तिम फूलों और प्रवालों से आरुणिमान ज्योति।
शब्दार्थ: जपारक्त=जपाकुसुम रंग, प्रसून=फूल, प्रवाल=मूंगा, अरुण=लालिमान।
प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
लंबे उदर, वक्र सूंड और एकदंत गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: प्रलम्बोदर=लंबा पेट, वक्रतुंड=वक्र सूंड।
विचित्रस्फुरद्रत्नमालाकिरीटं किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम्।
विचित्र रत्नमाला युक्त मुकुट, चंद्ररेखा से विभूषित।
शब्दार्थ: विचित्र=विविध, स्फुरद्रत्न=चमकते रत्न, किरीट=मुकुट।
विभूषैकभूशं भवध्वंसहेतुं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
आभूषणों का एकमात्र आभूषण, संसार-नाश का कारण गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: एकभूशं=एक आभूषण सज्जित, भवध्वंस=जगत् नाश।
उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूलोच्चलद्भ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम्।
उछलती भुजावल्ली मूल दृश्य, चंचल भ्रूलता से प्रकाशित दक्षिण भुजा।
शब्दार्थ: उदञ्चत्=उछलती, भुजावल्ली=भुजा लताएँ, भ्राजदक्ष=प्रकाशमान दक्षिण।
मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
मरुतसुंदरियों के चामर से सेवित गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: मरुत्सुन्दरी=वायुदेवी रूपी सुंदरियाँ।
स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं कृपाकोमलोदारलीलावतारम्।
कंपित कठोर चंचल पिंगाक्षी जिह्ना, कृपा-कोमल लीला अवतार।
शब्दार्थ: निष्ठुर=कठोर, आलोलपिंगाक्षी=चंचल पीली आँख जिह्ना।
कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यैर्गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥
कलाबिंदु (तीन नेत्र बिंदु) को योगिवर्य गाते हैं, गणाधीश को नमस्कार।
शब्दार्थ: कलाबिन्दु=कला बिंदु (ललाट बिंदु)।
यमेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम्।
एकाक्षर (ॐ), निर्मल, निर्विकल्प, गुणातीत आनंद, आकारशून्य।
शब्दार्थ: निर्विकल्प=विचार रहित, आकारशून्य=रूपरहित।
परं पारमोङ्कारमाम्नायगर्भं वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे॥
परम ओमकार, वेदगर्भ, पुराण गाते हैं उसे नमस्कार।
शब्दार्थ: अम्नायगर्भ=वेदों का गर्भ।
चिदानन्दसान्द्राय शान्ताय तुभ्यं नमो विश्वकर्त्रे च हर्त्रे च तुभ्यम्।
चिदानंद संनादित शांत को नमो, विश्वकर्ता-हर्ता को नमो।
शब्दार्थ: सान्द्र=घना, विश्वकर्त्रे=सृष्टिकर्ता।
नमोऽनन्तलीलाय कैवल्यभासे नमो विश्वबीज प्रसीदेशसूनो ॥
अनंतलीला, कैवल्यप्रकाश को नमो, विश्वबीज शिवपुत्र को नमो।
शब्दार्थ: कैवल्यभासे=मोक्ष प्रकाश।
इमं संस्तवं प्रातरुत्थाय भक्त्या पठेद्यस्तु मर्त्यो लभेत्सर्वकामान्।
सुबह उठकर भक्ति से पढ़ने वाला सभी कामनाएँ पाए।
गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचो गणेशे विभौ दुर्लभं किं प्रसन्ने॥
गणेश कृपा से वाणी सिद्ध, प्रसन्न गणेश में क्या दुर्लभ।
Singer - Disha Roy
Lyricist: Traditional
Album - Transcendental Vol 2
MUSIC COMPOSERS - Gourab Shome
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