सरस किशोरी वयस की थोरी भजन
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
सरस किशोरी, वयस की थोरी,
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
साधन हीन, दीन मैं राधे,
तुम करुणामयी प्रेम अगाधे,
काके द्वारे, जाय पुकारे,
कौन निहारे, दीन दुःखी की ओर,
सरस किशोरी, वयस की थोरी,
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
करत अघन नहिं नेकु उघाऊँ,
भजन करन में मन को लगाऊँ,
करी बरजोरी, लखि निज ओरी,
तुम बिनु मोरी, कौन सुधारे दोर।
सरस किशोरी, वयस की थोरी,
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
भलो बुरो जैसो हूँ तिहारो,
तुम बिनु कोउ न हितु हमारो,
भानुदुलारी, सुधि लो हमारी,
शरण तिहारी, हौं पतितन सिरमोर।
सरस किशोरी, वयस की थोरी,
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
गोपी-प्रेम की भिक्षा दीजै,
कैसेहुँ मोहिं अपनी करी लीजै,
तव गुण गावत, दिवस बितावत,
दृग झरि लावत, ह्वैहैं प्रेम-विभोर।
सरस किशोरी, वयस की थोरी,
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
पाय तिहारो प्रेम किशोरी,
छके प्रेमरस ब्रज की खोरी,
गति गजगामिनि, छवि अभिरामिनी,
लखि निज स्वामिनी, बने कृपालु चकोर॥
सरस किशोरी, वयस की थोरी,
रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
"साधन हीन, दीन मैं राधे, तुम करुणामई प्रेम-अगाधे" देवी चित्रलेखाजी
सरस किशोरी, वयस की थोरी, रति रस भोरी, कीजै कृपा की कोर।
श्री राधे, कीजै कृपा की कोर।
अर्थ: रसपूर्ण किशोरी (राधा), युवावस्था की धनी, रति (प्रेम) के रस से परिपूर्ण, कृपा की कर दो। श्री राधे, कृपा करो।
भाव: भक्त राधा के रसीले किशोर रूप की स्तुति कर कृपा मांगता है।
साधन हीन, दीन मैं राधे, तुम करुणामयी प्रेम अगाधे,
काके द्वारे, जाय पुकारे, कौन निहारे, दीन दुःखी की ओर।
अर्थ: हे राधे, मैं साधनरहित दीन हूँ, तुम करुणामयी और प्रेम की गहन सागर हो। कौवे के द्वार पर पुकारता हूँ, कौन देखेगा दीन दुखी की ओर?
भाव: भक्त अपनी निर्बलता स्वीकार कर राधा की अनंत करुणा पर भरोसा करता है।
करत अघन नहिं नेकु उघाऊँ, भजन करन में मन को लगाऊँ,
करी बरजोरी, लखि निज ओरी, तुम बिनु मोरी, कौन सुधारे दोर।
अर्थ: पाप करता हूँ, कोई नेक कार्य नहीं करता, भजन में मन लगाने का प्रयास करता हूँ। जबरदस्ती रोककर अपनी ओर देखो, तुम्हारे बिना कौन मेरी दशा सुधारेगा?
भाव: पापी भक्त भजन की ओर लौटने की इच्छा रखता है, राधा से सुधार की याचना करता है।
भलो बुरो जैसो हूँ तिहारो, तुम बिनु कोउ न हितु हमारो,
भानुदुलारी (सूरज की पुत्री), सुधि लो हमारी, शरण तिहारी, हौं पतितन सिरमोर।
अर्थ: अच्छा-बुरा जैसा हूँ, तुम्हारा हूँ, तुम्हारे सिवा कोई हितैषी नहीं। हे सूर्यकुमारी, हमारी सुधि लो, तुम्हारी शरण में पतितों का सरताज हूँ।
भाव: भक्त राधा को अपना एकमात्र हितकारी मान शरणागति करता है।
गोपी-प्रेम की भिक्षा दीजै, कैसेहुँ मोहिं अपनी करी लीजै,
तव गुण गावत, दिवस बितावत, दृग झरि लावत, ह्वैहैं प्रेम-विभोर।
अर्थ: गोपी-प्रेम की भिक्षा दो, किसी तरह मुझे अपना बना लो। तुम्हारे गुण गाता, दिन बिताता, नेत्रों से अश्रु बहाता, प्रेम से विभोर हो जाऊँ।
भाव: गोपी भाव का भिक्षुक भक्त बन राधा के गुणगान की कामना करता है।
पाय तिहारो प्रेम किशोरी, छके प्रेमरस ब्रज की खोरी,
गति गजगामिनी, छवि अभिरामिनी, लखि निज स्वामिनी, बने कृपालु चकोर।
अर्थ: हे किशोरी, तुम्हारा प्रेम पाकर ब्रज की कोरी (कन्या) प्रेमरस पीती। गजगामिनी गति वाली, मनोहर छवि वाली, अपने स्वामी को देखकर कृपालु चकोर (चाँदनी पीने वाली चकोरी) बन जाती।
भाव: राधा के प्रेम से भक्त ब्रज की गोपी बन जाता है, कृष्ण (स्वामी) को चकोरी की भाँति निहारती है।
यह भजन राधा की करुणा, प्रेम रस और किशोरी छवि पर केंद्रित है। भक्त अपनी दीनता, पाप और गोपी-भक्ति की इच्छा व्यक्त कर शरण लेता है। यह राधावल्लभ संप्रदाय या ब्रज रस भक्ति की परंपरा को दर्शाता है। रोज़ भजन गाने से मन शांत होता है।
