इस जग में मेरा कान्हा बिन तेरे कृष्णा भजन
इस जग में मेरा कान्हा बिन तेरे कृष्णा भजन
इस जग में मेरा, कान्हा बिन तेरे
कोई न सहारा है।
छोड़कर तू चला, कमी तेरी नहीं
दोष कुछ तो हमारा है।
जब आएगा माखन चुराने
द्वार को बंद मैं न करूँगी।
मेरे मटकों को तोड़ेगा तू तो
कोई न शिकायत करूँगी।
प्राण कैसे मेरे रहेंगे बिन तेरे
बहे अश्रु की धारा है।
छोड़कर...
क्यों कालिया के विष से बचाया
क्यों कूदा था यमुना जल में।
इन्द्र के कोप से क्यों छुड़ाया
क्यों उठाया गोबर्धन को पल में।
दूर विपदा किया, क्यों न मरने दिया
करता जब किनारा है।
छोड़कर...
ब्रज की गलियों को सूनी किया तू
हम पनघट पे आहें भरेंगी।
तेरी यादों में राधा व सखियाँ
आग के बिन विरह से जरेंगी।
कान्त मैया कहे, न जा लाला मेरे
तू तो अँखियों का तारा है।
कोई न सहारा है।
छोड़कर तू चला, कमी तेरी नहीं
दोष कुछ तो हमारा है।
जब आएगा माखन चुराने
द्वार को बंद मैं न करूँगी।
मेरे मटकों को तोड़ेगा तू तो
कोई न शिकायत करूँगी।
प्राण कैसे मेरे रहेंगे बिन तेरे
बहे अश्रु की धारा है।
छोड़कर...
क्यों कालिया के विष से बचाया
क्यों कूदा था यमुना जल में।
इन्द्र के कोप से क्यों छुड़ाया
क्यों उठाया गोबर्धन को पल में।
दूर विपदा किया, क्यों न मरने दिया
करता जब किनारा है।
छोड़कर...
ब्रज की गलियों को सूनी किया तू
हम पनघट पे आहें भरेंगी।
तेरी यादों में राधा व सखियाँ
आग के बिन विरह से जरेंगी।
कान्त मैया कहे, न जा लाला मेरे
तू तो अँखियों का तारा है।
गोपी विरह : इस जग में मेरा कान्हा बिन तेरे/रचना : श्री श्रीकान्त दास जी/स्वर : विप्र अमित सारस्वत जी
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बिना कान्हा के यह जग सूना है, कोई सहारा नहीं। तू चला गया, पर कमी तेरी नहीं, बल्कि कहीं न कहीं हमारी ही कमियाँ हैं। जब तू माखन चुराने आएगा, मैं द्वार बंद नहीं करूँगी। मेरे मटके तोड़े, तो भी कोई शिकवा नहीं करूँगी, क्योंकि तेरा आना ही मेरे लिए सब कुछ है। बिन तेरे प्राण कैसे जिएँ, आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही है।
क्यों तूने कालिय के विष से हमें बचाया? क्यों यमुना के जल में कूदा? इंद्र के कोप से क्यों हमें छुड़ाया और गोवर्धन को पल में क्यों उठाया? हर विपदा को दूर किया, पर अब क्यों हमें अकेला छोड़ दिया, जब तू ही हमारा किनारा है?
ब्रज की गलियाँ सूनी हो गईं, पनघट पर हम आहें भरते हैं। राधा और सखियाँ तेरी याद में तड़प रही हैं, जैसे बिना आग के विरह में जल रही हों। यशोदा मैया कहती हैं, "लाला, मत जा, तू मेरी आँखों का तारा है।" तेरा जाना ब्रज के हर दिल को बेकरार कर गया है, कान्हा, तू ही हमारा एकमात्र आधार है।
गोपी विरह : इस जग में मेरा कान्हा बिन तेरे/रचना : श्री श्रीकान्त दास जी/स्वर : विप्र अमित सारस्वत जी ।
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बिना कान्हा के यह जग सूना है, कोई सहारा नहीं। तू चला गया, पर कमी तेरी नहीं, बल्कि कहीं न कहीं हमारी ही कमियाँ हैं। जब तू माखन चुराने आएगा, मैं द्वार बंद नहीं करूँगी। मेरे मटके तोड़े, तो भी कोई शिकवा नहीं करूँगी, क्योंकि तेरा आना ही मेरे लिए सब कुछ है। बिन तेरे प्राण कैसे जिएँ, आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही है।
क्यों तूने कालिय के विष से हमें बचाया? क्यों यमुना के जल में कूदा? इंद्र के कोप से क्यों हमें छुड़ाया और गोवर्धन को पल में क्यों उठाया? हर विपदा को दूर किया, पर अब क्यों हमें अकेला छोड़ दिया, जब तू ही हमारा किनारा है?
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गोपी विरह : इस जग में मेरा कान्हा बिन तेरे/रचना : श्री श्रीकान्त दास जी/स्वर : विप्र अमित सारस्वत जी ।
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Author - Saroj Jangir
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