सुरति समाँणो निरति मैं निरति रही मीनिंग
सुरति समाँणो निरति मैं निरति रही निरधार मीनिंग
सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार।
सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥Surati Samano Nirati Me, Nirati Rahi Nirdhaar,
Surati Nirati Pacha Bhaya, Tab Khule Swayambh Duvaar.
कबीर दोहा / साखी हिंदी मीनिंग
- सुरति-प्रभु प्रेम, स्मृति.
- समाँणो-समा गई है.
- निरति मैं-वैराग्य में/निरंतर प्रेम.
- निरधार-अवलंब रहित.
- परचा भया-चमत्कार.
- स्यंभ दुवार शम्भू का द्वार.
कबीर दोहा हिंदी मीनिंग
इस पद में कबीर साहेब की वाणी है की श्रुति (इश्वर प्रेम रस) निरति में समा गया है. भगवान् का सुमिरण अनंत प्रेम में परिवर्तित हो गया है. इस प्रेम का कोई भी द्रष्टिगत या भौतिक आधार नहीं है. पूर्व में साधक का जो ध्यान बाहर भटक रहा था अब वह अंतर्मन में लग गया है. सुरती और निरति का यह मिलन किसी चमत्कार से कम नहीं है इस प्रकार से ब्रह्म के द्वार खुला है. जब साधना का प्रभु भक्ति से मिलन हो जाता है तो फिर इश्वर की प्राप्ति संभव हो पाती है. प्रेम जब निरंतर और अविरल प्रेम की धारा में बदल जाता है तो अवश्य ही आत्म द्वार खुल जाते हैं.
सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप।
लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥
Surati Samano Nirati Me, Ajapa Mahe Jaap,
Lekh Samano Alekh Main, Yu Aapa Mahe Aap.
कबीर दोहा हिंदी शब्दार्थ Kabir Doha Hindi Word Meaning
सुरति : आत्मा, चित्त की प्रवृति.
समाँणो : समा गई है.
निरति मैं : संसार से अलगाव.
अजपा : बिना जाप का, जिसका जाप नहीं किया गया है, मौन ध्यान.
लेख : प्रत्यक्ष और साकार.
समाँणाँ : समा गया है.
अलेख मैं : निराकार में.
आपा : ब्रह्म, पूर्ण परम ब्रह्म.
माँहै : के अन्दर.
कबीर दोहा/साखी हिंदी मीनिंग- इस दोहे का भाव है की इंगला और पिंगला एक हो गई हैं और नाम जाप की वृति अब मौन में बदल चुकी है. इस अवस्था में साकार और निराकार एक हो गए हैं, अब केवल निराकार ही शेष रह गया है. अब राम नाम जाप अब सतत और निरंतर सुमिरण होकर स्थाई हो गया है. इस प्रकार से आत्मा और पूर्ण परमात्मा एकाकार हो गए हैं. इस अवस्था में मौखिक जाप का कोई महत्त्व शेष नहीं रह जाता है.
यह चित्त में समां जाता है और यही सहज भक्ति का रूप भी है, जहाँ पर किसी बाह्य और भौतिक क्रियाओं का कोई महत्त्व शेष नहीं रह जाता है. बगैर राम जपे ही जाप संपन्न हो जाता है, यही भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है. ऐसी स्थिति में उसके स्वांस स्वांस में राम व्याप हो जाता है, अंग अंग में राम व्याप्त हो जाता है. भौतिक जगत में रहकर भी वह इस जगत से प्रथक हो जाता है. लेख अलेख में समा जाता है.
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Author - Saroj Jangir
दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं एक विशेषज्ञ के रूप में रोचक जानकारियों और टिप्स साझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें। |
