इक दिन बोले प्रभु रामचंद्र में मन की भजन
इक दिन बोले प्रभु रामचंद्र में मन की भजन
इक दिन बोले प्रभु रामचंद्र,में मन की बात बताता हूँ,
तुम लेटे रहो हनुमान,
यहाँ में तेरे चरण दबाता हूँ।
हनुमान हुए हैरान ये सुन,
बोले ऐसा न संभव है,
मालिक सेवक के दबावे चरण,
हे नाथ नहीं ये संभव है,
ये महापाप है मेरे प्रभु,
मैं जीते जी मर जाऊँगा,
तुम लेटे रहो हनुमान,
यहाँ में तेरे चरण दबाता हूँ।
प्रभु राम की वाणी सुन,
करके हनुमान बड़े हैरान हुए,
इच्छा अजीब मेरे राम की,
ये सुन के बड़े परेशान हुए,
ये अभी नहीं संभव है प्रभु,
जब होगा में बतलाऊंगा,
तुम लेटे रहो हनुमान,
यहाँ में तेरे चरण दबाता हूँ।
त्रेता के बाद युग द्वापर है,
युग में अवसर पाओगे,
में मुरली बन कर आऊंगा,
तुम कान्हा बन कर आओगे,
होठों से लगाना तुम मुझको,
में तेरे भक्त नचाऊँगा,
तुम लेटे रहो हनुमान,
यहाँ में तेरे चरण दबाता हूँ।
ये तुम जानो या में जानू,
प्रभु और कोई ये जाने ना,
मुरली के रूप में हनुमत है,
ये राम शिव कोई जाने ना,
दोनों की रहेगी मर्यादा,
मैं दोषी ना कहलाऊंगा,
तुम लेटे रहो हनुमान,
यहाँ में तेरे चरण दबाता हूँ।
इक दिन बोले प्रभु रामचंद्र,
में मन की बात बताता हूँ,
तुम लेटे रहो हनुमान,
यहाँ में तेरे चरण दबाता हूँ।
||इक दिन बोले प्रभु रामचंद्र || PURUSHOTTAM RAM BHAJAN BY SD||
Ik Din Bole Prabhu Raamachandr,
Mein Man Ki Baat Bataata Hun,
Tum Lete Raho Hanumaan,
Yahaan Mein Tere Charan Dabaata Hun.
रामचंद्र की यह बात सुनकर लगता है जैसे भक्ति की सारी मर्यादाएँ एक ओर हटकर प्रेम की एक अलग ही भाषा बोलने लगी हों। प्रभु खुद हनुमान के चरण दबाना चाहते हैं, जबकि हनुमान के लिए यह बात असंभव और महापाप जैसी लगती है। यही अंतर इस बात में गहराई भर देता है कि भक्त तो सिर्फ भक्त है, प्रभु भक्त को भक्त ही रहने देते हैं, लेकिन अपने प्रेम में उससे और भी निकट जाना चाहते हैं। दोनों के बीच यह खिंचाव ही भक्ति का सबसे गहन पहलू बन जाता है।
आगे राम बताते हैं कि द्वापर युग में यह अवसर मिलेगा—वे मुरली बनकर आएँगे, हनुमान भी कान्हा बनकर आएँगे, और फिर होठों से लगाकर, नाच‑नाचाकर वही चरण‑दबाने का प्रेम अलग रूप में बनेगा। यह कल्पना इस बात को दिखाती है कि भगवान और भक्त में जो दूरी दिखाई देती है, वह दिल से बहुत कम होती है। राम खुद यह भी कहते हैं कि यह रहस्य चाहे हनुमान जानें या यही वे जानें, बाहर से कोई यह न जाने, ताकि दोनों की मर्यादा बनी रहे, लेकिन अंदर का प्रेम फिर भी अनंत रहे। इस भाव से लगता है कि असली भक्ति वह है जहाँ प्रभु भक्त से सीधा‑सीधा प्यार माँगते हैं, और भक्त उसे मान कर भी विनम्र बने रहते हैं। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री राम जी की।
यह भजन भी देखिये