बरस रही राम रस भक्ति लूटन वाले लूट रहे

बरस रही राम रस भक्ति लूटन वाले लूट रहे

 

बरस रही राम रस भक्ति,
लूटन वाले लूट रहे।
पाते हैं जो हरी के बन्दे,
पाते हैं जो प्रभु के बन्दे,
छूटन वाले छूट रहे,
बरस रही राम रस भक्ति,
लूटन वाले लूट रहे।

कोई लुटे जप करके,
कोई लूटे तप करके,
कोई पिए भर भर प्याले,
लूटन वाले लूट रहे।
बरस रही राम रस भक्ति,
लूटन वाले लूट रहे।

कोई पीकर बना मतवाला,
कोई बैठा ध्यान करे,
कोई घर घर अलख जगावे,
कोई चारों धाम फिरे।
बरस रही राम रस भक्ति,
लूटन वाले लूट रहे।

कोई मन की प्यास बुझाए,
कोई अपने कष्ट मिटाएं,
कोई परमारथ ही के कारण,
कोई बन बाबा घूम रहे,
बरस रही राम रस भक्ति,
लूटन वाले लूट रहे।

कोई पिये हिमालय बैठा,
कोई पिये देवालय बैठा,
भक्तों का तो यही कहना है,
जीवन तेरा छूट रहा,
बरस रही राम रस भक्ति,
लूटन वाले लूट रहे।


भजन श्रेणी : कृष्ण भजन (Krishna Bhajan)


बरस रही है राम रस भक्ति लूटने वाले लूट रहे हैं Baras Rahi Hai Ram Ras Bhakti Bhajan Pandit Vaishnav Aacharya ji Rajesh ji Maharaj

Baras Rahi Raam Ras Bhakti,
Lutan Vaale Lut Rahe.
Paate Hain Jo Hari Ke Bande,
Paate Hain Jo Prabhu Ke Bande,
Chhutan Vaale Chhut Rahe,
Baras Rahi Raam Ras Bhakti,
Lutan Vaale Lut Rahe.

संसार के हर कोने में प्रेम, स्नेह और करुणा के रूप में ईश्वर की कृपा प्रकट है, पर केवल वही उसको अनुभव कर पाते हैं जिनके भीतर श्रद्धा की झोली फैली होती है। यह रस वही माधुर्य है जिसमें राम का नाम अमृत बनकर उतरता है और हृदय को निर्मल कर देता है। जो इस वर्षा में भी व्यस्तताओं और संशयों में उलझे हैं, वे सूखे रह जाते हैं, जबकि जो सहज मन से आगे बढ़ते हैं, उनके जीवन में यह अमृत टपक पड़ता है।

भक्ति का यह रूप किसी विधि या स्थान तक सीमित नहीं—it flows through every heart ready to receive it. कोई जप में रमकर उसे पाता है, कोई सेवा में, और कोई प्रेम की भावना से ओतप्रोत होकर। इस अवस्था में तप, ध्यान या तीर्थ सब एक माधुर्य में घुल जाते हैं। यह उस सागर का वर्णन है जहाँ ईश्वर का प्रेम सबको समान रूप से मिलता है, पर जिसे जितनी प्यास होती है, वह उतना ही पी लेता है। यही सच्ची अनुभूति है – जब मन पवित्र होकर कह उठता है कि कितना अद्भुत है यह समय, जब भक्ति की वर्षा चारों ओर छाई है, और जो इसे लूट ले रहे हैं, वे सच्चे अर्थों में जीवन का अमृत पा रहे हैं।
 
यह ठीक वैसी ही है जैसे आकाश से अमृत की वर्षा हो, लेकिन हम उस अमृत को बटोरने के लिए अपना पात्र ही नहीं खोलते। यह भक्ति की धारा किसी एक व्यक्ति, जाति या स्थान के लिए नहीं बह रही है—यह तो सार्वभौमिक प्रेम है, जो हर उस हृदय के लिए खुला है जिसमें थोड़ी भी प्यास है। असली समझदारी इसी में है कि जो लोग इस बहती हुई धारा को पहचान लेते हैं, वे अलग-अलग तरीकों से इस आनंद को अपने जीवन में भर लेते हैं—कोई मन को शांत करके जप में लीन हो जाता है, कोई कठिन तपस्या से स्वयं को शुद्ध करता है, और कोई बस प्रेम के भरे प्याले पीकर मस्त और मतवाला हो जाता है। ये सब उस एक ही परम सुख को पाने के अलग-अलग रास्ते हैं, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि जो लोग अभी भी दुनियावी उलझनों में फंसे हैं और इस अनमोल अवसर को गंवा रहे हैं, वे इस सुख से दूर होते जा रहे हैं। 
 
भक्ति का मार्ग इतना व्यापक है कि इसमें हर स्वभाव और हर तरह के प्रयास के लिए जगह है। कोई अपने मन को एकाग्र करके भीतर ही भीतर ध्यान में बैठ जाता है, तो कोई घर-घर जाकर प्रभु का नाम लोगों तक पहुँचाने का पुनीत कार्य करता है। कुछ लोग इस रस को पीकर अपने व्यक्तिगत कष्टों और मन की प्यास को शांत करते हैं, तो कुछ इसे परमार्थ का साधन बनाकर दूसरों के कल्याण के लिए जीवन जीते हैं। चाहे कोई हिमालय की ऊँचाई पर बैठा हो या मंदिर की शांत चौखट पर, यह प्रेम का रस हर जगह समान रूप से उपलब्ध है। यह बात हमें बहुत गहराई से समझ लेनी चाहिए कि जीवन का यह समय बहुत कीमती है और यह भक्ति की वर्षा हमेशा नहीं रहेगी।

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Pandit Vaishnav Aacharya ji Rajesh ji Maharaj

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