असां लुटिया गुरु दा प्यार भजन

असां लुटिया गुरु दा प्यार भजन


असां लुटिया गुरु दा प्यार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया गुरु दा प्यार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
साडा दिल लुटिया, साडा दिल लुटिया
साड़ी जुड़ गई नाम नाल तार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया

असी सतगुरु दे, सतगुरु साडे
सतगुरु नाल असी कर लई वायदे
असां छड्ड ना नहीं दरबार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया

लुट जांदे तेरे नाम दीवाने
प्रेम तेरे विच हो के मस्ताने
ओह तां हो जांदे भव तो पार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया

तन मन गुरु नूं कीता अर्पण
रोज गुरु दे करके दर्शन
असां जिंदगी लई सवार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया

सोहणे दे नाल ला के अखां
तर गईयां एथों रूहां लखां
सानूं तार्या ऐ सच्ची सरकार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया

सतगुरु वंडदे नाम खजाने
लै जांदे जो हों दीवाने
ओहदे खुले रहन भंडार
गुरु ने साडा दिल लुटिया
असां लुटिया


ऐसा भजन एक बार सुना तो बार बार सुनोगेअसां लुटिया गुरां दा प्यार गुरां ने साडा दिल लुटिया

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भक्त का हृदय गुरु के प्रेम में डूबा हुआ है, मानो गुरु ने उसका मन पूरी तरह जीत लिया हो। उसका मन गुरु के नाम से जुड़ गया है और वह गुरु के दरबार को कभी नहीं छोड़ता। वह सतगुरु के साथ वचनबद्ध है और उनके प्रेम में खोया रहता है। गुरु के नाम के दीवाने उनके प्रेम में मस्त होकर संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। भक्त ने अपना तन-मन गुरु को समर्पित कर दिया है और रोज़ उनके दर्शन कर अपनी जिंदगी को सार्थक बनाता है। गुरु की कृपा से उसकी आत्मा तृप्त होती है और उसे सच्चाई का मार्ग मिलता है। सतगुरु अपने नाम का खजाना बांटते हैं, जो उनके दीवानों को मिलता है, और उनके भंडार हमेशा खुले रहते हैं।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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