अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी गुरु भजन

अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी गुरु भजन

अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
बाहरों अंदरों मैं रंगी गई सारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी

एह न पूछो रंग पीला सी कि लाल सी
रंग जेडा वी सी बड़ा ही कमाल सी
वेख सोचां विच डुबियाँ ललारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी

गुरु चरनां च मथा जदों टेकेया
दसां की ओह नजारा जो मैं वेख्यां
वेखे अंग संग बांके बिहारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी

खोली गुरु जद सच दी किताब सी
मेनूं दित्ता हर सवाल दा जवाब सी
इक पल च मुकाई गल सारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी

गुरु ज्ञान वाला तीर जदों मारिया
नि मैं गले गले राम उचारया
सारे कहंदे मेनूं गुरु दी प्यारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी

गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
बाहरों अंदरों मैं रंगी गई सारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया
अंग अंग चढ़ी नाम दी खुमारी
गुरु ने ऐसा रंग सुट्टेया


गुरु भजन अंग अंग चड़ी नाम दी खुमारी गुरां ने ऐसा रंग सुटेया एक बार जरूर सुने

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भक्त के हर अंग में गुरु के नाम की मस्ती चढ़ी हुई है, जैसे गुरु ने उस पर ऐसा रंग चढ़ाया हो कि वह बाहर-भीतर पूरी तरह रंग गया है। यह रंग न पीला है, न लाल, बल्कि अनोखा और अद्भुत है, जिसे देखकर वह सोच में डूब जाता है। जब उसने गुरु के चरणों में माथा टेका, तो उसे ऐसा नजारा दिखा, मानो बांके बिहारी उसके साथ-साथ हैं। गुरु ने जब सत्य की किताब खोली, तो उसे हर सवाल का जवाब मिल गया और सारी गुत्थियां एक पल में सुलझ गईं। गुरु के ज्ञान के तीर ने उसे ऐसा छुआ कि वह हर पल राम का नाम जपने लगा। अब लोग उसे गुरु की प्यारी कहते हैं, क्योंकि गुरु ने उस पर ऐसा रंग चढ़ाया कि उसका पूरा अस्तित्व गुरु के प्रेम और ज्ञान में रंग गया है।
 
गुरु की महिमा (गुरु की महत्ता) भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्म में अत्यंत गहरी है। गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है—‘गु’ और ‘रु’। ‘गु’ का अर्थ है अंधकार या अज्ञान, और ‘रु’ का अर्थ है उसका निरोधक या उसे दूर करने वाला। अर्थात, गुरु वह है जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। गुरु की महिमा को शास्त्रों और संतों ने भगवान से भी बढ़कर बताया है। कहा जाता है कि गुरु के बिना संसार सागर को पार करना असंभव है, भले ही कोई ब्रह्मा, विष्णु या महेश के समान ताकतवर हो। सद्गुरु की कृपा से ही मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होता है। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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