सुन लाख टका की बात जो तोहिँ मानत भजन

सुन लाख टका की बात जो तोहिँ मानत भजन


सुन लाख टका की बात रे।
जो तोहिँ मानत रहत आपुनो, सुत दारा पितु भ्रात रे।
सो सब धोखा जान मूढ़ मन, है सब स्वारथ नात रे।
जब ये जानत नहिं आपन हित, भटकट जग दिन रात रे।
तब ये कहा करैं हित तेरो, तू इन कत पतियात रे।
अब ‘कृपालु’ तू तोरि नात सब, जोर नात बलभ्रात रे॥

भावार्थ :- अरे मन ! लाख टका की बात सुन । जो पुत्र, पिता, भाई आदि तुझे अपना मानते रहते हैं, यह सब धोखा है । क्योंकि वे लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही ऐसा करते हैं । अरे मन ! जब ये लोग अपना ही वास्तविक हित नहीं समझते और सांसरिक विषयों में भटकते रहते हैं तब भला ये तेरा क्या हित करेंगे । तू इन पर क्या विश्वास करता है । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! अब तू सबसे नाता तोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर से नाता जोड़ ले।


सुन लाख टका की बात रे | - ft.Akhileshwari Didi | प्रेम रस मदिरा | (14-11-21)

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संसार में जितने भी संबंध—पुत्र, पिता, भाई, पत्नी—सब स्वार्थ के धागों से जुड़े हुए हैं। ये संबंध बाहर से अपने लगते हैं, लेकिन जब गहराई से देखा जाए तो हर कोई अपने ही लाभ-हानि की चिंता में डूबा रहता है। जीवन की भागदौड़ और मोह-माया में लोग अपने सच्चे हित को भी नहीं पहचान पाते, वे दिन-रात संसार के भ्रम में भटकते रहते हैं। ऐसे में उनसे किसी निस्वार्थ प्रेम या सच्चे सहारे की अपेक्षा करना व्यर्थ है।

मनुष्य जब अपने ही कल्याण का मार्ग नहीं समझ पाता, तो वह दूसरों का भला क्या करेगा? इसलिए मन को चाहिए कि वह इन अस्थायी और स्वार्थी संबंधों पर भरोसा छोड़ दे। सच्चा संबंध और शाश्वत सहारा केवल प्रभु के साथ ही संभव है। जब मन संसार के सभी नातों से ऊपर उठकर श्यामसुंदर से नाता जोड़ लेता है, तब उसे सच्चा सुख, शांति और सुरक्षा का अनुभव होता है। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य और सबसे मूल्यवान सीख है।

रचयिता : जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
पुस्तक : प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी
पद संख्या : 114
पृष्ठ संख्या : 56
सर्वाधिकार सुरक्षित © जगद्गुरु कृपालु परिषत्

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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