डगमग नैया डोलती वाल्मीकि करतार

डगमग नैया डोलती वाल्मीकि करतार


डगमग नैया डोलती, वाल्मीकि करतार,
तोरे बिना मझधार में, कौन लगावे पार?
कौन लगावे पार...?

किसे पुकारे गोमती, कहाँ करे फरियाद?
मेरा भरोसा आप ही, त्रैलोकी के नाथ।
दासी की हर भूल को, बख्श दे दातार,
तोरे बिना मझधार में, कौन लगावे पार?
कौन लगावे पार...?

आशा है, विश्वास है, करोगे पूरण आस,
मेरे लाल कनोज की, फिर से जागे श्वास।
प्रकट होओ परमात्मा, बीत गए दिन चार,
तोरे बिना मझधार में, कौन लगावे पार?
कौन लगावे पार...?

दर्द मेरा राह देखे, सागर बड़ा विशाल,
वाल्मीकि बिना आपके, हाल हुए बेहाल।
आदि कवि संसार के, आप ही तारणहार,
तोरे बिना मझधार में, कौन लगावे पार?
कौन लगावे पार...?


DAG MAG NAIYA

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जीवन की नैया मझधार में डगमगाती है, और वाल्मीकि के बिना कोई पार नहीं लगाता। गोमती किनारे खड़ी पुकारती है, पर फरियाद सुनाने को कोई नहीं, सिवाय त्रिलोक के नाथ वाल्मीकि के, जिन पर पूरा भरोसा है। उनकी दासी की हर भूल को क्षमा करने की प्रार्थना की जाती है। आशा और विश्वास है कि वे मनोकामनाएँ पूरी करेंगे और कनोज के लाल को नया जीवन देंगे। चार दिन बीत गए, अब प्रभु के प्रगट होने की प्रतीक्षा है। दुखों का सागर विशाल है, और वाल्मीकि के बिना हाल बेहाल है। आदि कवि के रूप में वे संसार के तारणहार हैं। यह भजन वाल्मीकि के प्रति अटूट विश्वास, उनकी कृपा से दुखों के नाश, और भवसागर से पार उतरने की भावना को व्यक्त करता है। सतगुरु की क्रिया का मुख्य उद्देश्य भक्त को सत्य की ओर ले जाना है, जिससे वह जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो सके और अपने मूल स्थान सतलोक (परमधाम) को प्राप्त कर सके। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के विचार, भावनाएँ, कर्म और जीवन का उद्देश्य पूरी तरह बदल जाता है।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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