पूर्णब्रह्म स्तोत्रम् अर्थ महत्त्व
पूर्णब्रह्म स्तोत्रम् अर्थ महत्त्व Purnbrahm Stotram
पूर्णचन्द्रमुखं नीलिन्दुरूपं
उद्भासितं देवं दिव्यं स्वरूपम्
पूर्णं त्वं स्वर्णं त्वं वर्णं त्वं देवम्
पिता माता बन्धु त्वमेव सर्वम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
कुंचित केशं संचित वेशं
वर्तुल स्थूल नयनं ममेशम्
पीन कनीनिका नयन कोशम्
आकृष्ट ओष्ठं च उत्कृष्ट श्वासम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
नीलाचले चंचलया सहितम्
आदि देव निश्चलानन्दे स्थितम्
आनन्दकन्दं विश्वबिन्दुचन्द्रम्
नन्दनन्दनं त्वं इन्द्रस्य इन्द्रम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
सृष्टि स्थिति प्रलय सर्वमूलं
सूक्ष्माति सूक्ष्मं त्वं स्थूलाति स्थूलम्
कान्तिमयं अनन्तं अन्तिम प्रान्तं
प्रशान्त कुंतलं ते मूर्तिमन्तम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
यज्ञ तप वेद ज्ञानात् अतीतं
भाव प्रेम छन्दे सदा वशित्वम्
शुद्धात् शुद्धं त्वं च पूर्णात् पूर्णं
कृष्ण मेघ तुल्यं अमूल्यवर्णं
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
विश्व प्रकाशं सर्वक्लेशनाशम्
मन बुद्धि प्राण श्वास प्रश्वासम्
मत्स्य कूर्म नृसिंह वामनस्त्वं
वराह राम अनन्त अस्तित्वम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
ध्रुवस्य विष्णुत्वं भक्तस्य प्राणम्
राधा पति देव हे आर्तत्राणम्
सर्वज्ञान सारं लोकाधारम्
भाव संचारं अभाव संहारम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
बलदेव सुभद्रा पार्श्वे स्थितम्
सुदर्शन संगे नित्य शोभितम्
नमामि नमामि सर्वाङ्ग देवम्
हे पूर्णब्रह्म हरि मम सर्वम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
कृष्णदास हृदि भाव संचारम्
सदा कुरु स्वामी तव किंकरम्
तव कृपा बिन्दु हि एक सारम्
अन्यथा हे नाथ सर्व असारम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
इति श्री कृष्णदास विरचितं ‘पूर्णब्रह्म स्तोत्रम्’ सम्पूर्णम्।
उद्भासितं देवं दिव्यं स्वरूपम्
पूर्णं त्वं स्वर्णं त्वं वर्णं त्वं देवम्
पिता माता बन्धु त्वमेव सर्वम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
कुंचित केशं संचित वेशं
वर्तुल स्थूल नयनं ममेशम्
पीन कनीनिका नयन कोशम्
आकृष्ट ओष्ठं च उत्कृष्ट श्वासम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
नीलाचले चंचलया सहितम्
आदि देव निश्चलानन्दे स्थितम्
आनन्दकन्दं विश्वबिन्दुचन्द्रम्
नन्दनन्दनं त्वं इन्द्रस्य इन्द्रम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
सृष्टि स्थिति प्रलय सर्वमूलं
सूक्ष्माति सूक्ष्मं त्वं स्थूलाति स्थूलम्
कान्तिमयं अनन्तं अन्तिम प्रान्तं
प्रशान्त कुंतलं ते मूर्तिमन्तम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
यज्ञ तप वेद ज्ञानात् अतीतं
भाव प्रेम छन्दे सदा वशित्वम्
शुद्धात् शुद्धं त्वं च पूर्णात् पूर्णं
कृष्ण मेघ तुल्यं अमूल्यवर्णं
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
विश्व प्रकाशं सर्वक्लेशनाशम्
मन बुद्धि प्राण श्वास प्रश्वासम्
मत्स्य कूर्म नृसिंह वामनस्त्वं
वराह राम अनन्त अस्तित्वम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
ध्रुवस्य विष्णुत्वं भक्तस्य प्राणम्
राधा पति देव हे आर्तत्राणम्
सर्वज्ञान सारं लोकाधारम्
भाव संचारं अभाव संहारम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
बलदेव सुभद्रा पार्श्वे स्थितम्
सुदर्शन संगे नित्य शोभितम्
नमामि नमामि सर्वाङ्ग देवम्
हे पूर्णब्रह्म हरि मम सर्वम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
कृष्णदास हृदि भाव संचारम्
सदा कुरु स्वामी तव किंकरम्
तव कृपा बिन्दु हि एक सारम्
अन्यथा हे नाथ सर्व असारम्
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्।
इति श्री कृष्णदास विरचितं ‘पूर्णब्रह्म स्तोत्रम्’ सम्पूर्णम्।
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जीवन का हर क्षण उस परम सत्ता के प्रति समर्पण और प्रेम से परिपूर्ण हो, जो विश्व का आधार है, जो सृष्टि का मूल और हर आत्मा का आश्रय है। वह परमब्रह्म, जिसका स्वरूप चंद्रमा सा निर्मल और अनंत प्रकाश से युक्त है, हृदय में भक्ति का सागर उमड़ाता है। उसकी कृपा के एक बिंदु में ही सारा सुख, सारी शांति और सारा आनंद समाहित है। जब मन उसकी भक्ति में डूबता है, तो सारे क्लेश, भय और अभाव स्वतः नष्ट हो जाते हैं। वह प्रेम और करुणा का स्रोत है, जो हर रूप में—चाहे वह मत्स्य हो, राम हो, या नृसिंह—हमारी रक्षा करता है और जीवन को अर्थ प्रदान करता है। इस प्रेम में डूबकर ही आत्मा को सच्चा सुख और मुक्ति प्राप्त होती है।
उस अनंत सत्ता के दर्शन और भक्ति में ही जीवन की पूर्णता है। वह नीलाचल में विराजमान, विश्व का प्रकाश और हर हृदय का आधार है। उसकी सेवा और प्रेम में लीन होना ही सच्चा तप और सच्चा यज्ञ है। जब हृदय में उसका भाव जाग्रत होता है, तो सारी सृष्टि एक परिवार-सी प्रतीत होती है, जहां केवल प्रेम और एकता का ही वास है। उसकी कृपा के बिना यह जीवन असार है, परंतु उसके प्रेम में रमने से हर पल एक उत्सव बन जाता है। यह विश्वास और समर्पण ही वह मार्ग है, जो आत्मा को परम सत्य के निकट ले जाता है, जहां केवल शुद्धता, शांति और अनंत आनंद का ही साम्राज्य है।
उस अनंत सत्ता के दर्शन और भक्ति में ही जीवन की पूर्णता है। वह नीलाचल में विराजमान, विश्व का प्रकाश और हर हृदय का आधार है। उसकी सेवा और प्रेम में लीन होना ही सच्चा तप और सच्चा यज्ञ है। जब हृदय में उसका भाव जाग्रत होता है, तो सारी सृष्टि एक परिवार-सी प्रतीत होती है, जहां केवल प्रेम और एकता का ही वास है। उसकी कृपा के बिना यह जीवन असार है, परंतु उसके प्रेम में रमने से हर पल एक उत्सव बन जाता है। यह विश्वास और समर्पण ही वह मार्ग है, जो आत्मा को परम सत्य के निकट ले जाता है, जहां केवल शुद्धता, शांति और अनंत आनंद का ही साम्राज्य है।
"पूर्णब्रह्म स्तोत्रम्" एक अत्यंत भावपूर्ण स्तुति है, जो भगवान जगन्नाथ को समर्पित है। भगवान जगन्नाथ केवल विष्णु के अवतार नहीं, बल्कि पूर्ण ब्रह्म हैं – जिनमें न कोई सीमा है, न कोई अपूर्णता। यह स्तोत्र उनके स्वरूप, सौंदर्य, करुणा, और ब्रह्मांड के साथ उनके अनूठे संबंध को शब्दों में पिरोता है। हर श्लोक हमें उनके एक नए रूप से परिचित कराता है – जो न केवल देवता हैं, बल्कि एक पिता, माता, सखा और आत्मा के परम आधार भी हैं।
भगवान जगन्नाथ का चेहरा जैसे पूर्णिमा का चाँद – शांत, उज्ज्वल और मन को ठंडक देने वाला। उनका रंग गहरे नील रत्न की तरह है, जो उनकी रहस्यमयी गहराई और दिव्यता को दर्शाता है। इस श्लोक में भक्त उन्हें सिर्फ एक देवता नहीं, बल्कि जीवन के हर रिश्ते का केंद्र मानता है – वही हैं माँ, पिता, मित्र और आत्मा की आवाज़। यह स्तुति पूर्ण समर्पण का पहला कदम है।
यहाँ भगवान की सौंदर्य-छवि उभरती है – घुँघराले बाल, बड़ी-बड़ी नेत्रें और मधुर होंठ। उनकी साँसें ही जीवन की धड़कन हैं, उनका हर अंश सजीवता का प्रतीक है। यह श्लोक बताता है कि वह केवल देखने में सुंदर नहीं, बल्कि वह करुणा का साक्षात स्वरूप हैं, जिनकी उपस्थिति से संपूर्ण सृष्टि जीवित है।
भगवान जगन्नाथ, जिनका निवास है नीलाचल – पुरी का वह पवित्र धाम, जहाँ लक्ष्मीजी उनके साथ विराजती हैं। यहाँ भगवान आनंद के स्रोत के रूप में प्रकट होते हैं – वही कृष्ण जो यशोदा के ललना हैं, गोपियों के प्रियतम हैं, और देवताओं में देवता हैं। इस श्लोक में उनका दिव्य तेज, आनंद और भव्यता झलकती है।
यहाँ भगवान को सृष्टि, स्थिति और प्रलय – तीनों का आधार बताया गया है। वह वही हैं जो सूक्ष्मतम कण में भी विद्यमान हैं और विराट ब्रह्मांड में भी। फिर भी, वह भक्त के लिए सरल हैं, सुलभ हैं, और प्रेम से भरपूर हैं। वह कण-कण में व्याप्त पूर्णब्रह्म हैं।
इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि भगवान यज्ञ, तप या केवल ज्ञान से नहीं मिलते। वे सिर्फ सच्ची, निष्काम भक्ति से मिलते हैं। उनका स्वरूप गहरे मेघों जैसा है – रहस्यमय, गूढ़ और मन मोहने वाला। उनका प्रेम ही उनका स्वरूप है, और भक्त का सच्चा प्रेम ही उनका मार्ग है।
भगवान जगन्नाथ ही वे हैं जिन्होंने अनेक रूप धारण किए – मत्स्य, कूर्म, नरसिंह, वामन, राम। हर अवतार में उन्होंने धर्म की रक्षा की, मानवता का मार्गदर्शन किया। वह ब्रह्मांड के हृदय हैं, हर जीव की चेतना वही हैं। यह श्लोक उन्हें जीवन के पोषक और उद्धारक के रूप में नमन करता है।
वह राधा के प्रिय हैं, ध्रुव के स्वामी हैं। वह भक्त के मन में प्रेम जगाते हैं और ह्रदय से मोह और शून्यता को मिटा देते हैं। वह संसार की संरचना का आधार हैं और प्रत्येक प्राणी में प्रेम की अलख जगाते हैं। उनका हर आशीर्वाद एक जीवन को बदल देता है।
यहाँ भगवान को उनके पूर्ण स्वरूप – श्रीहरि के रूप में प्रणाम किया गया है। उनके साथ हैं बलराम, सुभद्रा और सुदर्शन। भक्त स्वयं को उनकी सेवा में समर्पित करता है – तन, मन, आत्मा से। यह श्लोक समर्पण की पराकाष्ठा है – जहाँ हर सांस, हर सोच भगवान को अर्पित होती है।
अंत में भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता – बस उनकी कृपा की एक बूंद। यही जीवन का सार है, यही संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। "कृष्णदास" के रूप में, वह खुद को भगवान का सेवक मानता है और उनकी कृपा में ही पूर्णता का अनुभव करता है।
"पूर्णब्रह्म स्तोत्रम्" सिर्फ एक स्तुति नहीं – यह प्रेम की, समर्पण की और आध्यात्मिक पूर्णता की एक यात्रा है। इसमें बताया गया है कि भगवान केवल यज्ञों से नहीं, दिल से मिलते हैं। वे वही हैं जो हमारे जीवन में रंग भरते हैं, अंधकार में प्रकाश देते हैं और हमारे भीतर छिपे हुए प्रेम को पहचानते हैं। भगवान जगन्नाथ का यह स्तोत्र हमें आत्मा के उस शाश्वत संबंध की याद दिलाता है जो केवल भक्ति के माध्यम से महसूस किया जा सकता है।
भगवान जगन्नाथ का चेहरा जैसे पूर्णिमा का चाँद – शांत, उज्ज्वल और मन को ठंडक देने वाला। उनका रंग गहरे नील रत्न की तरह है, जो उनकी रहस्यमयी गहराई और दिव्यता को दर्शाता है। इस श्लोक में भक्त उन्हें सिर्फ एक देवता नहीं, बल्कि जीवन के हर रिश्ते का केंद्र मानता है – वही हैं माँ, पिता, मित्र और आत्मा की आवाज़। यह स्तुति पूर्ण समर्पण का पहला कदम है।
यहाँ भगवान की सौंदर्य-छवि उभरती है – घुँघराले बाल, बड़ी-बड़ी नेत्रें और मधुर होंठ। उनकी साँसें ही जीवन की धड़कन हैं, उनका हर अंश सजीवता का प्रतीक है। यह श्लोक बताता है कि वह केवल देखने में सुंदर नहीं, बल्कि वह करुणा का साक्षात स्वरूप हैं, जिनकी उपस्थिति से संपूर्ण सृष्टि जीवित है।
भगवान जगन्नाथ, जिनका निवास है नीलाचल – पुरी का वह पवित्र धाम, जहाँ लक्ष्मीजी उनके साथ विराजती हैं। यहाँ भगवान आनंद के स्रोत के रूप में प्रकट होते हैं – वही कृष्ण जो यशोदा के ललना हैं, गोपियों के प्रियतम हैं, और देवताओं में देवता हैं। इस श्लोक में उनका दिव्य तेज, आनंद और भव्यता झलकती है।
यहाँ भगवान को सृष्टि, स्थिति और प्रलय – तीनों का आधार बताया गया है। वह वही हैं जो सूक्ष्मतम कण में भी विद्यमान हैं और विराट ब्रह्मांड में भी। फिर भी, वह भक्त के लिए सरल हैं, सुलभ हैं, और प्रेम से भरपूर हैं। वह कण-कण में व्याप्त पूर्णब्रह्म हैं।
इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि भगवान यज्ञ, तप या केवल ज्ञान से नहीं मिलते। वे सिर्फ सच्ची, निष्काम भक्ति से मिलते हैं। उनका स्वरूप गहरे मेघों जैसा है – रहस्यमय, गूढ़ और मन मोहने वाला। उनका प्रेम ही उनका स्वरूप है, और भक्त का सच्चा प्रेम ही उनका मार्ग है।
भगवान जगन्नाथ ही वे हैं जिन्होंने अनेक रूप धारण किए – मत्स्य, कूर्म, नरसिंह, वामन, राम। हर अवतार में उन्होंने धर्म की रक्षा की, मानवता का मार्गदर्शन किया। वह ब्रह्मांड के हृदय हैं, हर जीव की चेतना वही हैं। यह श्लोक उन्हें जीवन के पोषक और उद्धारक के रूप में नमन करता है।
वह राधा के प्रिय हैं, ध्रुव के स्वामी हैं। वह भक्त के मन में प्रेम जगाते हैं और ह्रदय से मोह और शून्यता को मिटा देते हैं। वह संसार की संरचना का आधार हैं और प्रत्येक प्राणी में प्रेम की अलख जगाते हैं। उनका हर आशीर्वाद एक जीवन को बदल देता है।
यहाँ भगवान को उनके पूर्ण स्वरूप – श्रीहरि के रूप में प्रणाम किया गया है। उनके साथ हैं बलराम, सुभद्रा और सुदर्शन। भक्त स्वयं को उनकी सेवा में समर्पित करता है – तन, मन, आत्मा से। यह श्लोक समर्पण की पराकाष्ठा है – जहाँ हर सांस, हर सोच भगवान को अर्पित होती है।
अंत में भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता – बस उनकी कृपा की एक बूंद। यही जीवन का सार है, यही संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। "कृष्णदास" के रूप में, वह खुद को भगवान का सेवक मानता है और उनकी कृपा में ही पूर्णता का अनुभव करता है।
"पूर्णब्रह्म स्तोत्रम्" सिर्फ एक स्तुति नहीं – यह प्रेम की, समर्पण की और आध्यात्मिक पूर्णता की एक यात्रा है। इसमें बताया गया है कि भगवान केवल यज्ञों से नहीं, दिल से मिलते हैं। वे वही हैं जो हमारे जीवन में रंग भरते हैं, अंधकार में प्रकाश देते हैं और हमारे भीतर छिपे हुए प्रेम को पहचानते हैं। भगवान जगन्नाथ का यह स्तोत्र हमें आत्मा के उस शाश्वत संबंध की याद दिलाता है जो केवल भक्ति के माध्यम से महसूस किया जा सकता है।
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Author - Saroj Jangir
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