मुझे अपना ले नंदलाल तुझ संग प्रीत लगी

मुझे अपना ले नंदलाल तुझ संग प्रीत लगी


मुझे अपना ले नंदलाल, तुझ संग प्रीत लगी।
हुई मैं पाकर तुझे निहाल, तुझ संग प्रीत लगी।।

बीच मंझधार मेरी नाव, है पतवार भी गुम।
तेरे भरोसे हूँ गोपाल, तुझ संग प्रीत लगी।।
हुई मैं पाकर तुझे निहाल, तुझ संग प्रीत लगी।
मुझे अपना ले नंदलाल, तुझ संग प्रीत लगी।।

नाम तेरा जपूँ निसदिन, ऐसी रटन लगे।
रहे तेरा ही बस ख़याल, तुझ संग प्रीत लगी।।
हुई मैं पाकर तुझे निहाल, तुझ संग प्रीत लगी।
मुझे अपना ले नंदलाल, तुझ संग प्रीत लगी।।

अधर पे बंसी हो मोहन, संग राधा दिखे।
हो जब ये साँसें मेरी बेहाल, तुझ संग प्रीत लगी।।
हुई मैं पाकर तुझे निहाल, तुझ संग प्रीत लगी।
मुझे अपना ले नंदलाल, तुझ संग प्रीत लगी।।

इश्क में तेरे हूँ पागल, न कोई ख़ैर-ख़बर।
मैं हूँ दरिया, तू है सागर, तुझ संग प्रीत लगी।।
हुई मैं पाकर तुझे निहाल, तुझ संग प्रीत लगी।
मुझे अपना ले नंदलाल, तुझ संग प्रीत लगी।।


Mujhe Apna le Nandlal, tujh sang prit lagi...... मुझे अपना ले नंदलाल तुझ संग प्रीत लगी

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Sung and written by Ranjana Gunjan Bhartia
Music by Sakal Deo Sahni
मुझे अपना ले नंदलाल तुझ संग प्रीत लगी...।।।।
गायिका एवं रचना रंजना गुंजन
संगीत सकल देव साहनी

बीच जीवन की मँझधार में जब नाव दिशाहीन और पतवार खो चुकी हो, उस क्षण केवल एक ही सहारा बचता है—नंदलाल का भरोसा। यह प्रेम ऐसा है जिसमें स्वयं का अस्तित्व मिटकर बस उसी की छाया में विश्राम मिलता है। नाम की रटन और स्मरण में ही दिन-रात बीतने लगते हैं, मन में हर वक्त उसी का ख्याल बसा रहता है। राधा-कृष्ण की छवि, अधरों पर बंसी की मधुरता और साँसों में उसकी उपस्थिति, जीवन के हर क्षण को दिव्यता से भर देती है। प्रेम की इस गहराई में खुद की सुध-बुध खो जाती है—जैसे दरिया सागर में समा जाता है, वैसे ही आत्मा नंदलाल के प्रेम में डूब जाती है। यह अनुभूति पूर्ण समर्पण, तृप्ति और आत्मिक आनंद की है, जहाँ नंदलाल को पा लेना ही जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य और तृप्ति बन जाता है।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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