खेल हैं जग से निराले मोहन मुरलीवाले भजन

खेल हैं जग से निराले मोहन मुरलीवाले भजन

खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

पहले खेल रचे मोहन ने,
खुल गये जेल के ताले,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

दूजे खेल रचे मोहन ने,
जमुना ने चरण पखारे,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

तीजे खेल रचे मोहन ने,
आय पूतना मारे,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

चौथी खेल रचे मोहन ने,
काले नाग नाथ डारे,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

पांचवे खेल रचे मोहन ने,
नख पर गिरिवर धारे,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

छठवीं खेल रचे मोहन ने,
जाये कंस को मारे,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

सब तो कहते कारे कारे,
हमको प्राणों से प्यारे,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।

खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले,
खेल हैं जग से निराले,
मोहन मुरली वाले।


भजन श्रेणी : कृष्ण भजन (Krishna Bhajan)
भजन श्रेणी : खाटू श्याम जी भजन (Khatu Shyam Ji Bhajan)

तेरे खेल है जग से निराले मेरे मोहन मुरली वाले।। कृष्ण भजन।।

जब साधक मोहन मुरली वाले जी के चमत्कारों को याद करता है, तो मन में आश्चर्य और भक्ति का सैलाब उमड़ पड़ता है। जेल के ताले खोलना, जमुना के चरण धोना, पूतना का अंत करना—हर खेल दुनिया से अलग चमकता है। काले नाग को नाथना, गोवर्धन को नाखून पर धारण करना, कंस का नाश करना, ये सब इश्वर का आशर्वाद ही तो दिखाते हैं। साधक देखता है कि कैसे हर संकट में मोहन जी ने लीला रची, दुनिया को हैरान कर दिया।
 

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