भोले भांग तिहारी नित घोटत हारी भजन

भोले भांग तिहारी नित घोटत घोटत हारी भजन

 
भोले भांग तिहारी नित घोटत घोटत हारी भजन

-दोहा-
संग बैठती पार्वती, शिव देते उपदेश,
ध्यानमग्न सब सुन रहे, कार्तिक और गणेश।
भोले भांग तिहारी घोटत हारी
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।
एक दीना की होवे तो घोटु,
रोज न घोटी जाये।

सुण गणपति की महतारी,
तुम घोटो भांग हमारी।
बिन भांग रहा न जाए,
गोरा तुम्हे छोड़ दू,
पर भांग न छोड़ी जाये।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

जिस दिन से तुम ब्याह कर लाये,
भाग्य हमारे फूटे।
राम करे ऐसा हो जाए,
सिल्ला लोढ़ी फूटे हा फूटे हा फूटे
रोज रोज की घोटा घोटी,
हमसे सही ना जाये।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

एक दिन सुनकर शिवशंकर ने,
खोला अपना झोला।
एक चरस की पुड़िया निकाली,
एक भंग का गोला हा गोला हा गोला।
पार्वती को चीड़ा चीड़ा कर,
शंकर भोग लगाये।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

कोई पिये चाय का प्याला,
कोई कोका कोला।
आप सदा शिव यह क्या पीते,
नित भंग का गोला।
ऐसी भांग से बाज आई,
में कैलाश छोड़ भाग जाऊ।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

Second Version
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।
एक दीना की होवे तो घोटु,रोज न घोटी जाये।

सुण गणपति की महतारी,
तुम घोटो भांग हमारी।
बिन भांग रहा न जाए,
गोरा तुम्हे छोड़ दू,
पर भांग न छोड़ी जाये।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

जिस दिन से तुम ब्याह कर लाये,
भाग्य हमारे फूटे।
राम करे ऐसा हो जाए,
सिल्ला लोढ़ी फूटे हा फूटे हा फूटे।
रोज रोज की घोटा घोटी,
हमसे सही ना जाये।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

एक दिन सुनकर शिवशंकर ने,
खोला अपना झोला।
एक चरस की पुड़िया निकाली,
एक भंग का गोला हा गोला हा गोला,
पार्वती को चीड़ा चीड़ा कर,
शंकर भोग लगाये।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये।

कोई पिये चाय का प्याला,
कोई कोका कोला।
आप सदा शिव यह क्या पीते,
नित भंग का गोला।
ऐसी भांग से बाज आई,
में कैलाश छोड़ भाग जाऊ।
भोले भांग तिहारी में घोटत घोटत हारी,
मेरे सगरे हाथ दुखाये। 


भोला भांग तुम्हारी में घोटत घोटत हरी | Jaya kishori Hit bhajan शिव भजन | Bhajan Vandana

जब कैलाश पर शाम ढलती है, पार्वती जी बैठी रहती हैं, शिव जी उपदेश देते हैं, कार्तिक और गणेश ध्यान में डूबे सुनते हैं। लेकिन बीच-बीच में पार्वती का मन उखड़ जाता है, क्योंकि रोज-रोज भांग घोटने का काम पड़ता है। हाथ दुख जाते हैं, पीठ अकड़ जाती है, फिर भी भोले की आदत नहीं छूटती। वो कहती हैं—एक दिन की हो तो घोट लूँ, रोज-रोज की ये घोटाई सहन नहीं होती। गणपति की माँ पुकारती हैं कि तुम घोटो हमारी भांग, बिना भांग के तो भोले रह ही नहीं सकते। गोरा को छोड़ दूँगी, पर भांग नहीं छोड़ूँगी।

जिस दिन से ब्याह हुआ, लगता है भाग्य फूट गया। रोज की घोटाई से जी जलता है, मन कहता है काश सिल्ला और लोढ़ी फूट जाएँ। एक दिन शिव जी ने सब सुन लिया, झोला खोला, चरस की पुड़िया और भांग का गोला निकाला। पार्वती को चिढ़ाकर, चिढ़ाकर भोग लगाया। फिर हँसते हुए बोले—कोई चाय पीता है, कोई कोक, और तुम्हारा शिव तो नित भांग का गोला पीता है। ऐसी भांग से बाज आई, कैलाश छोड़कर भाग जाऊँगी—पर भोले की वो मस्ती, वो भांग की लत, वो करुणा सब कुछ इतना अपना है कि पार्वती भी अंत में मुस्कुरा देती हैं। भोले की ये आदत भी उनकी लीला है, जो घर को जीवंत रखती है, भले हाथ दुख जाएँ। आप सभी पर ईश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री शिव जी की।

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