साधो मैं बैरागन हरी की भूषण वस्त्र भजन

साधो मैं बैरागन हरी की भूषण वस्त्र भजन

साधो मैं बैरागन हरी की भजन

साधो मैं बैरागन हरी की,
साधो मैं बैरागन हरी की,
साधो मैं बैरागन हरी की,

भूषण वस्त्र सभी हम त्यागे 
खान पान विसरायो,
एह बृजवासी कहत 
वनवारी मैं दासी गिरधर की,
साधो मैं बैरागन हरी की,



Main Bairagan Houngi - Usha Timothi | मैं बैरागन होऊंगी - उषा तिमोथी | Audio | Sanskar Bhajan

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भजन "साधो मैं बैरागन हरी की" भगवान कृष्ण के प्रति एक भक्त की अटूट भक्ति, वैराग्य और पूर्ण समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। इसमें भक्त अपनी सांसारिक मोह-माया, जैसे भूषण, वस्त्र और खान-पान, को त्यागकर केवल हरि के चरणों में अपनी आस्था और जीवन को समर्पित करने की बात कहता है। "बैरागन हरी की" का भाव यह दर्शाता है कि भक्त ने संसार के सभी बंधनों को छोड़कर केवल कृष्ण की भक्ति को अपनाया है, और स्वयं को उनकी दासी के रूप में देखता है। "एह बृजवासी कहत, वनवारी मैं दासी गिरधर की" पंक्ति में बृज की भक्ति परंपरा और राधा-कृष्ण के प्रेम का गहरा आध्यात्मिक संदेश झलकता है, जो भक्त की आत्मा का पूर्णतः कृष्ण में विलय होने का प्रतीक है। यह भजन भक्त के हृदय में उठने वाली उस पवित्र भावना को उजागर करता है, जो संसार को तुच्छ मानकर केवल परमात्मा की शरण में सुख और शांति पाती है।
 
साधु की दुनिया में जब हरी का नाम दिल में बस जाता है, तो सारे भूषण, वस्त्र, सारी सज-धज छूट जाती है। खान-पान की फिक्र मिट जाती है, जैसे शरीर सिर्फ़ एक साधन रह गया हो, आत्मा की यात्रा के लिए। बृज की गलियों में वो आवाज़ गूँजती है – मैं गिरधर की दासी हूँ, वनवारी की सेवा में लगी हूँ। ये बैरागिनी का रूप नहीं, ये तो प्रेम की वो आग है जो सारे संसार को राख कर देती है और सिर्फ़ एक नाम को बाकी रखती है।

हर सांस में बस वो नाम, हर कदम में बस वो धाम। न कोई चाह बची, न कोई आसक्ति। जो कुछ था वो त्याग दिया, क्योंकि जो मिला है वो इतना बड़ा है कि बाकी सब छोटा लगने लगा। गिरधर की दासी बनकर रहना ही अब जीवन का मतलब हो गया। साधो, ये बैरागिनी नहीं, ये तो हरी की वो प्रेमिका है जो दुनिया से अलग होकर भी सबसे जुड़ी हुई है। बस एक नाम में खो जाना, और सब कुछ पा लेना। 
 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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