जोगी जुग से न्यारा रे संतो आध्यात्मिक भजन

जोगी जुग से न्यारा रे संतो आध्यात्मिक भजन


जोगी जुग से न्यारा रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे,
जगत जंजाल भरमना में भुला,
जोगी रेवे निराधारा,
रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे।।

तीरथ जावे, जल में नहावे,
मंदिर जोवे कीरतारा,
साधु तीरथ घट में नहावे,
दर्शन करे दीदारा,
जोगी जुग से न्यारा रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे,
जगत जंजाल भरमना में भुला,
जोगी रेवे निराधारा।।

गीता पढ़े, भागवत वाचे,
मूरत पूजे पुजारा,
जोगी जुगत मुगत रा दाता,
परसे हरि जन प्यारा,
जोगी जुग से न्यारा रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे,
जगत जंजाल भरमना में भुला,
जोगी रेवे निराधारा।।

करम भरम शरम में बांधा,
किस विध उतरे पारा,
काटे करम भरम की फांसी,
जोगी करे निस्तारा रे,
जोगी जुग से न्यारा रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे,
जगत जंजाल भरमना में भुला,
जोगी रेवे निराधारा।।

जोगी जुगत रे आद ओतरो,
समझे संत इशारा,
केवे हेमनाथ सुणो भाई साधु,
ऐसा ब्रह्म विचारा रे,
जोगी जुग से न्यारा रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे,
जगत जंजाल भरमना में भुला,
जोगी रेवे निराधारा।।

जोगी जुग से न्यारा रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे,
जगत जंजाल भरमना में भुला,
जोगी रेवे निराधारा,
रे संतो,
जोगी जुग से न्यारा रे।।



गुरु महिमा | जोगी जुग से न्यारा | जोगभारतीजी| Jogi Jug Se NyaraSanta | Guru Mahima I #Jogbharti Ji

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तेरे नित नम्र चलन में एक अलग सी शांति है; जोगी की सरलता दुनिया के जंजाल से मुक्त कर, मन को सीधे उस निर्धार्य आनंद पर ले आती है जो शब्दों से परे है। तीर्थ और मण्डप की दिखावटी ऊँचाइयों के बीच जोगी की अविचल मौन भूमि सच्ची श्रद्धा की मिट्टी बन जाती है—जहाँ पढ़े-लिखे शास्त्र भी थमकर उसके भीतर के अचल अनुभव की कसौटी पर झुकते हैं। गीता-भागवत से परे, उस तपशील में जो वह जीता है, हर कर्म-फंदा कट जाता है; उसकी आँखों की सूझ और निस्वार्थ व्यवहार में परमेश्वर का आंचल झलकता है। जब दुनिया भटकाती है, जोगी की एक सूझी बात, एक मौन संकेत ही काफी होता है कि मन का भ्रम छंटे और आत्मा का रास्ता सरल हो जाए। उस निर्लिप्त, परंतु करुणामयी उपस्थिति से भय-शंका ढह जाते हैं; यही वजह है कि जोगी जाति से अलग, युगों से अनोखा और सबके लिए एक नरम, अविचल आधार बनकर जीता है।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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