गोबिन्द पौष बड़ा खावो कृष्णा भजन
गोबिन्द पौष बड़ा खावो कृष्णा भजन
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,गोबिन्द पौष बडा खावो,
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,
गोबिन्द पौष बडा खावो।
पौष मास लागै अति सुन्दर,
कञ्चण थाळ धरयो चोकी पर,
आसण़ बिछा दियो मखमल रो,
गोबिन्द पौष बडा पावो,
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,
गोबिन्द पौष बडा खावो।
रङ्ग महल मं पड़दा झुकायै,
ठण्डी पवन लग नहीं पायै,
अङ्गीठी तपत भवन धरवाई,
गोबिन्द पौष बडा पावो,
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,
गोबिन्द पौष बडा खावो।
पौष बडा मं केसर घाल्या,
अदरक री चटणी रुचकारी,
सब्जी हलवो पूड़ी न्यारी,
गोबिन्द पौष बडा पावो,
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,
गोबिन्द पौष बडा खावो।
जमणां जळ झारी भरवाई,
गोबिन्द आचमन करबा ताई,
बिडलो पांच कुट रो हाजर,
गोबिन्द पौष बडा पावो,
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,
गोबिन्द पौष बडा खावो।
कवै रामधन अरजी मानो,
प्रीत पुराणी मन मं जाणो,
सखियां ठाडी न्होरा खावै,
गोबिन्द पौष बडा पावो,
जुल्मी जाडो भोत पड़ै छै,
गोबिन्द पौष बडा खावो।
श्रीश्याम शरणम् ममः।
Julmi Jaado Bhot Pade Che गोबिन्द पौष बड़ा खावो— Paush Bada Festival Thikana Mandir Jaipur
पौष की ठंढ से जब जुल्मी जाड़ा भोत पड़ने लगता है, तब घर में एक अलग ही उमंग जागती है। खाना‑खजाना तैयार होता है और पौष का खाजा मानो घर की ठंढ को भी गुनगुना बना देता है। कंचन की थाली पर सजे बर्तन, मखमल के आसन, अंगीठी की गरमाहट और रंगभरे पड़दे—ये सब मिलकर एक ऐसा नज़ारा बना देते हैं कि लगता है जैसे ठंढ भी मनाई हुई मेहमान हो, जो अंदर घुसने नहीं पाती। ऐसे पल यादों में छोटे‑छोटे सुख बनकर रह जाते हैं, जो बड़ी बातों से ज़्यादा दिल को छू जाते हैं।
खाने की तैयारी में भी एक खास प्रेम‑भाव घुला रहता है। केसर घोला हुआ पौष बड़ा, अदरक की चटनी, हलवा, सब्ज़ी, पूड़ियाँ—सब एक दूसरे के साथ मिलकर खाने को उत्सव बना देते हैं। जमा हुआ जल, न्हाने की तैयारी, सखियों का झौंकना—ये सब लगता है मानो घर में कोई छोटा‑सा त्योहार चल रहा हो, जिसमें हर बारीक काम में प्रेम और सेवा छुपी हो। इस भाव से लगता है कि जीवन की सच्ची समृद्धि कोई ऊँचा‑ऊँचा दरबार नहीं, बल्कि वही छोटी थाली, वही गरम अंगीठी और वही घरवालों की मुस्कान है, जिसे श्रीश्याम की शरण में समर्पित कर देने से वह और भी रंगीन हो जाती है। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री श्याम जी की।
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