राम सुमिर ले सुमिरन कर ले यही मुक्ति भजन
राम सुमिर ले सुमिरन कर ले यही मुक्ति भजन
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला॥
एक डाल दो पंछी बैठ्या,
कौन गुरु, कौन चेला रे।
गुरु की करनी गुरु भरेला,
चेला की करनी चेला रे।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
मन माली का न बाग लगाया,
अद्भुत बौदिया कैला रे।
कच्चा-पक्का की जात न जानी,
खाया फूल घनेरा रे।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
राजाजी न कुण्ड खुदाया,
अधबीच रख दिया गैला रे।
पापी नर तू नाल धो ले,
धो ले मन का मैला।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी,
जोड़ भरया एक थैला रे।
कहत कबीर, सुनो भाई साधो,
संग में ना जाए इक धैला रे।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला॥
यही मुक्ति का गैला।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला॥
एक डाल दो पंछी बैठ्या,
कौन गुरु, कौन चेला रे।
गुरु की करनी गुरु भरेला,
चेला की करनी चेला रे।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
मन माली का न बाग लगाया,
अद्भुत बौदिया कैला रे।
कच्चा-पक्का की जात न जानी,
खाया फूल घनेरा रे।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
राजाजी न कुण्ड खुदाया,
अधबीच रख दिया गैला रे।
पापी नर तू नाल धो ले,
धो ले मन का मैला।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी,
जोड़ भरया एक थैला रे।
कहत कबीर, सुनो भाई साधो,
संग में ना जाए इक धैला रे।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला।
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला॥
राम सुमिर ले, सुमिरन कर ले,
यही मुक्ति का गैला।
भाई तेरा सतगुरु देरिया हैला॥
Guru mahima bhajan
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तेरे नाम की स्मृति जब मन में गूंजती है, तो हर रिश्ता हल्का होकर केवल सच्चाई की ओर खिंच जाता है; सतगुरु की छवि में वह मार्ग दिखाई देता है जो भ्रम और माया के जाल को चीरकर सीधे मुक्ति तक ले जाए। गुरु का एक स्पर्श भीतर के बाग में फूल उगा देता है जहाँ जात-पात, ठाठ-बाट सब फिका पड़ जाते हैं और केवल आत्मा का पोषण रह जाता है। नादानी और पापों की धूल कितनी भी घनी हो, गुरु की दी हुई दीक्षा और राम-सुमिरन की लयी में वे सभी कटकर निर्मलता बन जाती हैं। माया का बोझ जितना भारी लगे, वह भी जब सतगुरु के साथ साझा होता है तो हल्का हो जाता है; और जो धन-दौलत संजो कर रखा है, उसका भी मर्म समझ आ जाता है—सच्ची साधना के आगे सब कुछ क्षणिक लगता है। इस विश्वास में जीवन का आवेग बदलकर शांति बन जाता है, और हर सांस अब मुक्ति की ओर एक कदम सिद्ध होती है।
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Author - Saroj Jangir
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