साथीड़ा केणो मान नारायण भजले राम भजन
साथीड़ा केणो मान नारायण भजले राम भजन
चलती चाकी देख के,
दिया कबीरा रोय,
दो पाटों के बीच में,
साबुत बचे ना कोय।
चाकी चाकी सब कहे,
कीला कहे ना कोय,
जे कीला का सुमिरन करे,
बाल ना बांका होय।।
साथीड़ा केणो मान,
भाईड़ा केणो मान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
बिना रे पांखां गो एक सुवटो रे,
उड़ियो जाव असमान,
पांख नहीं जां रे, चोंच नहीं,
कोनी काया रो आधार,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
बायड़ो सोनो कोनी निपजै रे,
मोती लागे कोनी डाल,
रूप उधारो बीरा ना मिले रे,
मांग्यो आवे कोनी काम,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
हाड़ हट्या रे, गोड़ा टूटग्या रे,
सिर पर आग्या धोला बाल,
नैणां वालो नीर ढलत आयो रे,
अब थारे क्यां रो है गुमान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
ओ भवसागर ऊंडो घणो रे,
नदियां बहे अपरम्पार,
दास डूंगरपुरी बोलिया रे,
हरी भज, उतरो परली पार,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
साथीड़ा केणो मान,
भाईड़ा केणो मान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
दिया कबीरा रोय,
दो पाटों के बीच में,
साबुत बचे ना कोय।
चाकी चाकी सब कहे,
कीला कहे ना कोय,
जे कीला का सुमिरन करे,
बाल ना बांका होय।।
साथीड़ा केणो मान,
भाईड़ा केणो मान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
बिना रे पांखां गो एक सुवटो रे,
उड़ियो जाव असमान,
पांख नहीं जां रे, चोंच नहीं,
कोनी काया रो आधार,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
बायड़ो सोनो कोनी निपजै रे,
मोती लागे कोनी डाल,
रूप उधारो बीरा ना मिले रे,
मांग्यो आवे कोनी काम,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
हाड़ हट्या रे, गोड़ा टूटग्या रे,
सिर पर आग्या धोला बाल,
नैणां वालो नीर ढलत आयो रे,
अब थारे क्यां रो है गुमान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
ओ भवसागर ऊंडो घणो रे,
नदियां बहे अपरम्पार,
दास डूंगरपुरी बोलिया रे,
हरी भज, उतरो परली पार,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
साथीड़ा केणो मान,
भाईड़ा केणो मान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
चेतावनी भजन विशाल कविया भाईड़ा केणो मान नारायण भजले राम Vishal Kaviya
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तेरी चक्की की ठहाके में जो पकता है, वह सिर्फ आटा नहीं—ज़िन्दगी की सच्ची कसौटी है; दो पाटों के बीच की पीस से जब सब कुछ बिखर जाता है, तो दिखावों की पूरी बनावट धूल में मिल जाती है। कबीरा की आँखों से उतरता वो ताप यह बतलाता है कि मिट्टी पर जो बचता है, वही असली मूल्य रखता है; कीला-की सुमिरन करने वाला ही बाल-बाल बचता है, बाकी सब छलावे की चादर में लिपटे होते हैं। साथियों-भाइयों की शोभा, धन-दौलत की चमक, सब उसी चक्की की तरह क्षणभंगुर हैं—बिना सच्चे पंख के कोई ऊँचा न उड़े, और बिना आंतरिक आधारे का शरीर बेसहारा रह जाता है। जीवन के ओठों पर जब सच्ची भक्ति उतरती है तो भय और अभिमान दोनों पिघल जाते हैं; वही भजन और राम-नाम की लय उस पार ले जाती है जहाँ नदियाँ बहती हैं, पर दुःख का दायरा खत्म हो जाता है। इस पीस में जो बचा वही शुद्ध—वहीं असली जीवन का मूल है।
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Author - Saroj Jangir
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