रे मन तेरो कोइ नहीं खिंचि लेइ जिनि हिंदी मीनिंग

रे मन तेरो कोइ नहीं खिंचि लेइ जिनि हिंदी मीनिंग Re Man Tero Koi Nahi Meaning

रे मन तेरो कोइ नहीं, खिंचि लेइ जिनि भारु ॥
बिरख बसेरो पंखि को, तैसो इहु संसारु ॥१॥

राम रसु पीआ रे ॥
जिह रस बिसरि गए रस अउर ॥१॥ रहाउ ॥

अउर मुए क्या रोईऐ, जउ आपा थिरु न रहाइ ॥
जो उपजै सो बिनसि है, दुखु करि रोवै बलाइ ॥२॥

जह की उपजी तह रची, पीवत मरदन लाग ॥
कहि कबीर चिति चेतिआ, राम सिमरि बैराग ॥३॥२॥१३॥६४॥
Lyrics in Gurumukhi -
ਰੇ ਮਨ ਤੇਰੋ ਕੋਇ ਨਹੀ, ਖਿੰਚਿ ਲੇਇ ਜਿਨਿ ਭਾਰੁ ॥
ਬਿਰਖ ਬਸੇਰੋ ਪੰਖਿ ਕੋ, ਤੈਸੋ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੧॥

ਰਾਮ ਰਸੁ ਪੀਆ ਰੇ ॥
ਜਿਹ ਰਸ ਬਿਸਰਿ ਗਏ ਰਸ ਅਉਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥

ਅਉਰ ਮੁਏ ਕਿਆ ਰੋਈਐ, ਜਉ ਆਪਾ ਥਿਰੁ ਨ ਰਹਾਇ ॥
ਜੋ ਉਪਜੈ ਸੋ ਬਿਨਸਿ ਹੈ, ਦੁਖੁ ਕਰਿ ਰੋਵੈ ਬਲਾਇ ॥੨॥

ਜਹ ਕੀ ਉਪਜੀ ਤਹ ਰਚੀ, ਪੀਵਤ ਮਰਦਨ ਲਾਗ ॥
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਚਿਤਿ ਚੇਤਿਆ, ਰਾਮ ਸਿਮਰਿ ਬੈਰਾਗ ॥੩॥੨॥੧੩॥੬੪॥

रे मन तेरो कोइ नहीं, खिंचि लेइ जिनि भारु ॥
हे मन! इस संसार में वास्तव में कोई भी सदा के लिए तेरा नहीं है, चाहे तू किसी का कितना भी बोझ या जिम्मेदारी क्यों न उठाए।
बिरख बसेरो पंखि को, तैसो इहु संसारु ॥१॥
यह संसार उस पक्षी के समान है जो वृक्ष पर थोड़ी देर के लिए बसेरा करता है और फिर उड़ जाता है; संसार का साथ भी अस्थायी है। ॥१॥
राम रसु पीआ रे ॥
मैं प्रभु-नाम का अमृतमय रस पी रहा हूँ।
जिह रस बिसरि गए रस अउर ॥१॥ रहाउ ॥
उस दिव्य रस का आनंद प्राप्त होने पर संसार के अन्य सभी रस और आकर्षण भूल गए हैं। ॥१॥ रहाउ ॥
अउर मुए क्या रोईऐ, जउ आपा थिरु न रहाइ ॥
जब हम स्वयं ही इस संसार में स्थायी नहीं हैं, तो दूसरों की मृत्यु पर अत्यधिक शोक क्यों करें?
जो उपजै सो बिनसि है, दुखु करि रोवै बलाइ ॥२॥
जो भी जन्म लेता है, उसका नाश निश्चित है; इसलिए अत्यधिक विलाप करना उचित नहीं है। ॥२॥
जह की उपजी तह रची, पीवत मरदन लाग ॥
जिस परमात्मा से यह सृष्टि उत्पन्न हुई है, अंत में सब उसी में विलीन हो जाते हैं; इसलिए प्रभु-रस का पान करो और उसी से जुड़े रहो।
कहि कबीर चिति चेतिआ, राम सिमरि बैराग ॥३॥२॥१३॥६४॥
कबीर जी कहते हैं: मेरा चित्त प्रभु-स्मरण में जाग्रत हो गया है। राम का सिमरन करते-करते मेरे भीतर वैराग्य उत्पन्न हो गया है और संसार का मोह छूट गया है। ॥३॥२॥१३॥६४॥
 
 
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यह शबद हमें जीवन की नश्वरता और परमात्मा की शरण में रहने का गहन संदेश देता है। संसार के सभी संबंध अस्थायी हैं और कोई भी व्यक्ति सदा के लिए हमारा नहीं है। जैसे पक्षी कुछ समय के लिए वृक्ष पर बसेरा करता है और फिर उड़ जाता है, वैसे ही यह संसार भी क्षणभंगुर है। इसलिए मनुष्य को सांसारिक मोह, अहंकार और अत्यधिक शोक में नहीं फँसना चाहिए। जो जन्म लेता है उसका अंत भी निश्चित है, अतः मृत्यु पर विलाप करने के बजाय जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझना चाहिए। कबीर जी बताते हैं कि प्रभु-नाम का रस सबसे श्रेष्ठ है; जो व्यक्ति इस दिव्य रस का अनुभव कर लेता है, उसके लिए संसार के अन्य सभी आकर्षण फीके पड़ जाते हैं। अंततः सब कुछ उसी परमात्मा से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। इसलिए मनुष्य को निरंतर प्रभु-स्मरण करते हुए वैराग्य, विवेक और भक्ति का मार्ग अपनाना चाहिए। 
 
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