जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे राम भजन

 
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे राम भजन

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे,
काको नाम पतित पावन जग,
केहि अति दीन पियारे।

कौन देव बिराई बिरद हित,
हठि हठि अधम उधारे,
खग मृग व्याध,
पाषाण बिटप जड,
यवन कवन सुर तारे,
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।

देव दनुज मुनि नाग मनुज सब,
माया बिबस बिचारे,
तिनके हाथ दास तुलसी,
प्रभु कहां अपनपौ हारे,
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।

Jaun kahan taji charan।Vinay Patrika વિનય પત્રિકા বিনয পত্রি@shriram_bhakti @rambhajansonotek

यह गहन भाव मनुष्य की उस स्थिति को व्यक्त करता है जहाँ वह चारों दिशाओं में भटकने के बाद अन्तःकरण से अनुभव करता है — कि प्रभु चरणों को छोड़कर अब कहीं और जाना संभव ही नहीं। यहाँ शरणागति की वह सरलता और निष्कपटता झलकती है जो भक्ति की सर्वोच्च अवस्था कही जाती है। जब तुलसीदास कहते हैं, “जाऊँ कहाँ तजि चरण तुम्हारे,” उसमें समर्पण की पूर्णता है — अहंकार, भय, अपेक्षा, सब कुछ गल जाता है। अब न मन में विकल्प है, न तर्क; केवल विश्वास है कि यही आसरा अंततः उबारने वाला है। यह वाणी उस व्यक्ति की प्रतीति है जो संसार की हर चकाचौंध देख चुका, पर अब जान चुका है कि असली अनुरक्ति केवल ईश्वर से ही संभव है।

इस भाव में एक करुण सत्य भी छिपा है — कि जैसे कोई पापी भी उनकी कृपा से पावन बन जाता है, वैसे ही हर जीव में उनके चरणों तक पहुँचने का अधिकार है। चाहे वह पक्षी हो, व्याध हो, या जड़ वस्तु — राम का नाम सबको तारता है। यही कारण है कि तुलसीदास को लगता है, उनसे बढ़कर कोई दूसरा रक्षक नहीं। देव, दानव, मनुष्य, मुनि — सभी माया के वशीभूत हैं, पर प्रभु ही ऐसे हैं जिनका प्रेम सबको एक कर देता है। ऐसा भाव किसी धार्मिक कर्मकांड से नहीं, बल्कि हृदय की साधना से उत्पन्न होता है; और जब यह भाव उठता है, तब सारा जीवन एक वाक्य में सिमट जाता है — “जाऊँ कहाँ तजि चरण तुम्हारे।”

Jaun kahan taji . Vinay Patrika 
Singer ~~~ Rajkumar Bhardwaj 
अर्थ पूर्ण, भाव पूर्ण भजनों की अभिव्यक्ति के 
आध्यात्मिक गायक
॥ राजकुमार भारद्वाज ॥
My Original Bhajan Available On 

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