सतगुरु आया रे सैया म्हारे पावणा भजन

सतगुरु आया रे सैया म्हारे पावणा भजन

 

सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।

चोक बुवारूँ रे पंखी मोर सू,
आसन ढलाऊँ चंदन पाठ,
सतगुरु आया रै,
सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा,
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।

चँवर ढूलाऊँ रै,
काचा दुध से,
चँवर धुलाऊँ कर चाँव,
सतगुरु आया रै,
सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा,
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।

शब्द सुनाया रै,
सतसंग माईने,
खोल्या म्हारा,
हिवड़ा रा भाग,
सतगुरु आया रै,
सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा,
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।

भर्म मिटायो रै,
भोला जीव को,
लागी म्हारे शब्दा कि मार,
सतगुरु आया रै,
सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा,
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।

बाई मीरा कि,
वो सतगुरु विनती,
दिज्यो म्हारो जन्म सुधार,
सतगुरु आया रै,
सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा,
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।

सतगुरु आया रे,
सैया म्हारे पावणा,
जाग्या पुरबला भाग,
सतगुरु आया रै।


सतगुरु आया है सैंया मारे पावणा सिंगर रामकुमार मालुणी

हृदय में एक ऐसी अलौकिक प्रसन्नता और भक्ति का भाव उमड़ता है, जो सतगुरु के आगमन को जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। यह आगमन केवल शारीरिक उपस्थिति नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण और भाग्य के उदय का प्रतीक है। भक्त अपने गुरु की सेवा में चंदन का आसन, मोरपंख की छवि, और कच्चे दूध से चंवर ढुलाकर अपनी श्रद्धा अर्पित करता है, जो उसकी नम्रता और समर्पण को दर्शाता है। सतगुरु का सान्निध्य एक ऐसी ज्योति है, जो भक्त के हृदय में ज्ञान और प्रेम की किरणें बिखेरता है, जिससे जीवन का हर अंधेरा मिट जाता है। यह उत्सव उस पवित्र बंधन का गान है, जो भक्त को सतगुरु के चरणों में बांधकर उसे सत्य और मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है।

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