मैंने मानुष जनम तुझको हीरा दिया

मैंने मानुष जनम तुझको हीरा दिया भजन

मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया,
जो तू व्यर्थ गवायें,
तो मैं क्या करूँ।

मूल वेदो का सब कुछ,
बता ही दिया,
अब समझ में ना आये,
तो मैं क्या करूँ,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

अन्न दूध आदि खाने को,
सब कुछ दिया,
मेवा मिष्ठान भी,
मैंने पैदा किया,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

फिर भी निर्दयी हो,
जीवो को सताने लगा,
मास मदिरा ही खाये,
तो मैं क्या करूँ,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

दीन दुखियो के,
दिल को दुखाने लगा,
रात दिन पाप में,
मन लगाने लगा,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

तूने जैसा किया,
वैसा पाने लगा,
अब तू आंसू बहाये,
तो मैं क्या करूँ,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

नाम हरि का तेरा,
पाप भी काट दे,
जो तू पाप करने से,
मन डाँट दे,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

मैं चाहता हूँ आजा,
तू हरि की शरण,
अब तू ही ना आये,
तो मैं क्या करूँ,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

छोड़ कर छल कपट,
आजा हरि की शरण,
कट जाये सहज,
तेरा आवागमन,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।

जो कोई ना मानेगा,
हरि के वचन,
यही चक्कर लगाये,
तो मैं क्या करूँ,
मैंने मानुष जनम,
तुझको हीरा दिया।


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