कहा चुनावै मेडीया चूना माटी लाय मीनिंग

कहा चुनावै मेडीया चूना माटी लाय Kaha Chunave Bhediya Meaning Kabir Ke Dohe

कहा चुनावै मेडीया, चूना माटी लाय |
मीच सुनेगी पापिनी, दौरी के लेगी आप ||

Kaha Chunave Bhediya, Chuna Mati Lay,
Meech Sunegi Papini, Douri Ke Legi Aap.

कहा चुनावै मेडीया चूना माटी लाय हिंदी मीनिंग Kaha Chunave Bhediya Meaning

कबीर के दोहे का हिंदी मीनिंग (अर्थ/भावार्थ) Kabir Doha (Couplet) Meaning in Hind

जीवन की अल्पता के विषय पर कबीर साहेब का कथन है की तुम किस मुगालते में ऊँचे ऊँचे महल मेडिया बना रहे हो ? तुम तो चुना माटी के महल बना रहे हो। एक रोज पापिनी मौत तुमको आ कर दबोच लेगी और इसमें ज्यादा समय नहीं लगेता।  अतः जीवन को सफल बनाने के लिए तुमको हरी की भक्ति करनी चाहिए। इस दोहे का मूल भाव यह है कि मनुष्य को भौतिक सुखों के पीछे भागने की बजाय अपने जीवन को सार्थक बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उसे अपने जीवन का उपयोग दूसरों की सेवा और ईश्वर की प्राप्ति के लिए करना चाहिए। 

 कबीर के इस दोहे का भाव है कि मनुष्य जीवन में ऊंचे-ऊंचे महल, दीवारें (मेड़िया) चुनने में लगा है, मगर उसकी असलियत केवल चुना और मिट्टी की है—अर्थात सब भौतिक सुख-सुविधाएँ नश्वर हैं। कबीर कहते हैं, एक दिन ऐसी ‘पापिनी’ यानी मृत्यु आएगी, जो सब कुछ छीन लेगी और इसमें अधिक समय नहीं लगेगा। यह संसार की अस्थिरता और माया की क्षणिकता पर व्यंग्य है; जो संसार में उलझा और भौतिक चीजों के पीछे भागता है, वह मौत के हाथों फंस जाता है। इसलिए जीवन को सार्थक बनाना है तो प्रभु-भक्ति, सेवा और सत्कर्मों में लगना चाहिए, न कि माया-मोह में। 

जीवन की क्षणभंगुरता और माया के मोह पर कबीर का यह दोहा एक गहन चेतावनी देता है, जहां मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भागता हुआ ऊंचे-ऊंचे महल और दीवारें (मेड़िया) बनाने में लिप्त रहता है, लेकिन ये सब चूना-मिट्टी के नश्वर निर्माण मात्र हैं। यह व्यंग्य संसार की अस्थिरता पर है, जहां व्यक्ति अपनी ऊर्जा व्यर्थ के भवन निर्माण में लगाता है, बिना यह सोचे कि सब कुछ एक दिन समाप्त हो जाएगा। पापिनी मृत्यु की यह तुलना एक ऐसी शक्ति से है जो बिना देर किए आकर सब कुछ छीन लेती है, और इसमें कोई भेदभाव नहीं। यह स्मरण कराता है कि जीवन अल्प है, और मिट्टी से उत्पन्न यह शरीर भी मिट्टी में ही विलीन हो जाएगा, इसलिए भौतिक संग्रह की होड़ व्यर्थ है।


इस दोहे का मूल संदेश आध्यात्मिक जागरण की ओर इशारा करता है, जहां कबीर सलाह देते हैं कि मनुष्य को माया के जाल में फंसने के बजाय ईश्वर भक्ति और सत्कर्मों में जीवन व्यतीत करना चाहिए। मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर जीते जी ही आत्म-चिंतन और सेवा का मार्ग अपनाना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है, क्योंकि भौतिक संपत्ति न तो साथ जाती है और न ही मृत्यु को रोक सकती है। यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्चा धन आंतरिक शांति और प्रभु प्राप्ति में है, जो नष्ट होने योग्य नहीं, बल्कि अमर है। 

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं कबीर के दोहों को अर्थ सहित, कबीर भजन, आदि को सांझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें

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