दुख दर्द यहाँ सहता है सच बोलने वाला
दुख दर्द यहाँ सहता है सच बोलने वाला
दुख-दर्द यहाँ सहता है, सच बोलने वाला,
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
सब कुछ है दिखावा यहाँ,
किस पर यक़ीन करूं मैं?
सूरत तो भोली-भाली,
मगर दिल तो है काला।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
हकीकत बयां करूं,
तो ज़ुबां कांपने लगी।
धनवानों ने छीना यहाँ,
निर्धन से निवाला।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
एहतेराम, वफ़ा, रूपगिर
कैसे, कहाँ मिलें?
नफ़रत ने छुपाया है,
मोहब्बत का उजाला।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
सब कुछ है दिखावा यहाँ,
किस पर यक़ीन करूं मैं?
सूरत तो भोली-भाली,
मगर दिल तो है काला।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
हकीकत बयां करूं,
तो ज़ुबां कांपने लगी।
धनवानों ने छीना यहाँ,
निर्धन से निवाला।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
एहतेराम, वफ़ा, रूपगिर
कैसे, कहाँ मिलें?
नफ़रत ने छुपाया है,
मोहब्बत का उजाला।
भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला।।
दुख दर्द यहां सहता है सच बोलने वाला भगवान तेरी दुनिया का दस्तूर निराला महाराज श्री रूपगिरीजी भरतपुर
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संसार का नियम अक्सर विरोधाभासों से भरा प्रतीत होता है। जो सत्य बोलता है, वह उपेक्षा और संघर्ष सहता है, जबकि असत्य और दिखावा सम्मानित दिखने लगता है। यह स्थिति मनुष्य के स्वार्थ और मोह-माया की देन है, जहाँ बाहरी चेहरे सरल और भोले दिखाई देते हैं, परंतु भीतर की प्रवृत्तियाँ छल और कपट से भरी रहती हैं। यही असंतुलन देखने वाले को विचलित करता है और यह अनुभव कराता है कि ईश्वर की बनाई दुनिया का दस्तूर सचमुच निराला है।
धन और सामर्थ्य के प्रभाव में आज वह मूल्य दबे हुए हैं जो कभी जीवन के आधार थे—सत्य, एहतेराम, और वफ़ा। निर्धनों से निवाला तक छीन लिया जाता है, और नफ़रत के साए मोहब्बत के प्रकाश को ढक देते हैं। यह युग ऐसा है जहाँ वास्तविक संवेदनाएँ दुर्लभ हो गई हैं और लोग बाहरी आडंबर में सच्चाई को भूल गए हैं। किंतु इन विरोधाभासों के बीच भी यही आस्था जन्म लेती है कि प्रभु का न्याय शाश्वत है, और समय के साथ वह सत्य को उजागर कर हर असंतुलन को संतुलन में ला देता है। यही विश्वास कठिनाइयों में मन को सहारा देता है कि भले ही दुनिया के दस्तूर निराले हों, पर ईश्वर की करुणा और न्याय अमिट और अटल हैं।
धन और सामर्थ्य के प्रभाव में आज वह मूल्य दबे हुए हैं जो कभी जीवन के आधार थे—सत्य, एहतेराम, और वफ़ा। निर्धनों से निवाला तक छीन लिया जाता है, और नफ़रत के साए मोहब्बत के प्रकाश को ढक देते हैं। यह युग ऐसा है जहाँ वास्तविक संवेदनाएँ दुर्लभ हो गई हैं और लोग बाहरी आडंबर में सच्चाई को भूल गए हैं। किंतु इन विरोधाभासों के बीच भी यही आस्था जन्म लेती है कि प्रभु का न्याय शाश्वत है, और समय के साथ वह सत्य को उजागर कर हर असंतुलन को संतुलन में ला देता है। यही विश्वास कठिनाइयों में मन को सहारा देता है कि भले ही दुनिया के दस्तूर निराले हों, पर ईश्वर की करुणा और न्याय अमिट और अटल हैं।
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Admin - Saroj Jangir
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